अयोध्या पर वार्ता संभव नहीं, सुप्रीम कोर्ट फैसले से न बचे

संपादकीय
21 मार्च 2017


कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह लिखा था कि बड़े-बड़े मामलों में भारत की अदालतें झिझक जाती हैं। कुछ ऐसा ही आज सुप्रीम कोर्ट ने किया जब उसने अयोध्या के बाबरी मुद्दे को अदालत के बाहर निपटाने की सलाह दी, और कहा कि दोनों पक्ष अगर मानें तो सुप्रीम कोर्ट अपने किसी जज को मध्यस्थता के लिए भी बिठा सकता है, और उच्च न्यायाधीश ने कहा कि जरूरत रहे तो वे खुद भी मध्यस्थ बनने को तैयार हैं। यह मामला आधी सदी से उत्तरप्रदेश के अयोध्या में चल रहा है कि जहां बाबरी मस्जिद थी, वहां पर क्या राम का जन्म हुआ था, और क्या बाबर ने उसी मंदिर की जगह पर मस्जिद बनाई थी? अदालत में इस मामले के चलते हुए भी 1992 में उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार ने मस्जिद को गिर जाने दिया था, और अदालत से किए गए अपने वायदे को नहीं निभाया था। इसके बाद की घटनाएं सब लोगों को याद हैं कि किस तरह देश भर में दंगे हुए, मुंबई बम धमाके हुए, गोधरा हुआ, और गुजरात दंगे हुए।
यह मामला निचली अदालत से लेकर उत्तरप्रदेश के हाईकोर्ट तक चलने में ही कई दशक लग गए। और हाईकोर्ट के फैसले के बाद उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील को भी कई बरस हो गए, लेकिन अदालत इस पर फैसले से एक किस्म से कतराती हुई दिखती है। यह बात किसी धर्म के मानने वाले तो कर सकते हैं कि आस्था किसी भी अदालत से ऊपर है, लेकिन अदालत का अपनी जिम्मेदारी से कतराना ठीक नहीं है। ऐसा भी नहीं कि सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी नहीं है कि इसके पहले भी मध्यस्थता की बहुत कोशिश हो चुकी है, और बात किसी किनारे नहीं पहुंची है। इस बीच बाबरी मस्जिद को गिराने का मामला अदालत में चल ही रहा है, और चौथाई सदी बाद भी सबसे छोटी अदालत से भी किसी को सजा नहीं हुई है।
एक बात बड़ी साफ है कि बाबर ने अपने वक्त में जो किया होगा, उस वक्त तो इस देश में लोकतंत्र नहीं था, किसी संविधान का राज नहीं था, और सभी धर्मों के लिए बराबरी का दर्जा भी उन दिनों में नहीं था। इसलिए बीसवीं सदी में आकर, आजाद भारत की आधी सदी पूरी हो जाने के वक्त अगर बाबरी मस्जिद को सार्वजनिक उकसावे और भड़कावे से गिराया गया था, और जिसके नतीजे के रूप में हजारों जानें गई थीं, तो उस जुर्म का निपटारा तो जमीन के विवाद और मंदिर-मस्जिद के निपटारे से परे भी होना चाहिए था जो कि दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। ऐसा भी नहीं कि देश की सर्वोच्च अदालत को अलग-अलग मामलों में अलग-अलग महत्व समझ न आता हो, सुप्रीम कोर्ट संजय दत्त से लेकर सुब्रत राय सहारा तक के मामले अंधाधुंध रफ्तार से सुनने के लिए बैठ जाता है, और कई मामलों के लिए विशेष अदालत बना देता है, विशेष जांच दल बना देता है, अपनी निगरानी में जांच करवाता है, लेकिन ऐसी कोई भी प्राथमिकता बाबरी मस्जिद गिराने के मामले को देना सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी नहीं समझा, और इसके आरोपियों को केंद्रीय मंत्री बन जाने दिया, राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल बन जाने दिया, और अदालत को ऐसी कोई जल्दी नहीं दिखती है कि आजाद भारत के इस एक सबसे बड़े जुर्म पर इंसाफ हो जाए। ऐसा सुप्रीम कोर्ट आज हाईकोर्ट के सुनाए गए फैसले पर फैसला लेना से कतरा रहा है, और फिर एक ऐसी मध्यस्थता की बात कर रहा है कि जिसके चलते फिर कई दशक लग सकते हैं, और मस्जिद गिराने वाले जिंदगी पूरी जीकर चैन से आजाद चल बस सकते हैं। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और अदालत को अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए। अभी पहली प्रतिक्रिया यह आई है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने किसी बातचीत से इंकार कर दिया है, और सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह फैसला सुनाए। इसके बाद अदालत के पास और कोई रास्ता नहीं बचता है, बजाय इसे निपटाने के। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट की सारी बातें केवल जमीन के हक के मुकदमे की रहीं, और उससे परे एक दूसरा मुकदमा मस्जिद गिराने का भी है, वह तो एक आपराधिक मामला है, और उसमें किसी मध्यस्थता की कोई गुंजाइश नहीं है, इसलिए देश की सबसे बड़ी अदालत को इंसाफ की अपनी नीयत साबित करनी चाहिए। बहुत से फैसले कड़वे होते हैं, और कड़े मन से करने पड़ते हैं, लेकिन जो भी ताकत और फैसला की कुर्सी पर बैठते हैं, उन्हें कई बार अप्रिय काम भी करना पड़ता है, और सुप्रीम कोर्ट को इससे कतराने की अब कोई इजाजत नहीं मिल सकती क्योंकि एक पक्ष ने किसी बातचीत से इंकार कर दिया है।

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