गंगा-यमुना बचाने आया फैसला एक आदिवासी सोच से उपजा हुआ

संपादकीय
22 मार्च 2017


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अभी एक फैसले में देश की दो प्रमुख नदियों, गंगा और यमुना को इंसानों जैसे अधिकार देते हुए यह कहा कि इनको प्रदूषित करना उसी तरह अपराध माना जाए जिस तरह किसी इंसान या जानवर के साथ जुल्म करना अपराध होता है। हाईकोर्ट ने कहा कि अब गंगा-यमुना को वही अधिकार हैं जो देश का कानून और संविधान किसी भी नागरिक को देता है। अदालत ने इस संबंध में न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी का भी उदाहरण दिया जिसे इस तरह का दर्जा दिया गया है। न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक संघर्ष करता रहा। माओरी समुदाय वांगानुई नदी को अपना पूर्वज मानता है। इस नदी पर उसकी आस्था अगाध है।
यह फैसला आज के हिन्दुस्तान में एकदम अनोखा है क्योंकि अब भारत की सरकार और अधिकतर राज्यों की सरकारें लगातार कुदरत पर मार करते चलने में भरोसा रख रही हैं। कारखानों के लिए जमीन और खनिज, खदानों के लिए जंगल, और कारखानों से लेकर शहरों तक के लिए पानी, इन तमाम मुद्दों पर सरकार और कारखानेदार का मिलाजुला रूख कमाई के आंकड़ों का रहता है, और धरती के साथ इस रफ्तार से, इस परले दर्जे की ज्यादती हो रही है, कि उसे धरती माता कहना भी अब ठीक नहीं लगता। कोई बहुत बुरी औलाद ही मां के साथ इतने जुल्म कर सकती है जितने कि हिन्दुस्तान जैसे देश के लोग, और खासकर यहां की सरकारें, कुदरत के साथ कर रही हैं। पांच बरस के कार्यकाल को पूरा करने के पहले ही अगले चुनाव को जीतने की तैयारी में सरकारें और राजनीतिक दल, इन दोनों का रूख कमाई के आंकड़े पेश करने में रहता है, और धरती का अगले हजारों बरस का जो नुकसान हो रहा है, वह किसी की फिक्र का सामान नहीं बनता। नतीजा यह है कि जिन नदियों के किनारे दुनिया भर में बसाहट हुई और संस्कृतियां विकसित हुईं, उन तमाम नदियों का हाल आज यह है कि उनमें डुबकी लगाना भी खतरनाक हो गया है। जिन नदियों को मां कहा जाता है, जिस गंगा के पानी को मरते इंसान के मुंह में टपकाकर हिन्दू यह मानते हैं कि मरते-मरते गंगाजल सीधे स्वर्ग ले जाएगा, उसी गंगा में उसी हिन्दू धर्म के लोग न सिर्फ पूजा-पाठ का भयानक प्रदूषण छोड़ते हैं, बल्कि उसके किनारे लाशों को जलाते हुए अधजली लाशें भी बहा देते हैं। नदियों के किनारे के शहर अपनी गंदगी को बिना साफ किए हुए सारा पानी और पखाना सीधे इन्हीं गंगा-यमुना में छोड़ देते हैं, और इनमें शहरी आबादी में हिन्दुओं का जितना हिस्सा होता है, कम से कम गंदगी में भी उतना हिस्सा तो उनका होता ही है। दूसरी तरफ कारखानों की गंदगी नदियों में इस रफ्तार से मिल रही है कि मरते के लिए गंगाजल लाने को शायद सीधे गंगा के उद्गम गोमुख पर जाना होगा।
इसलिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस फैसले को हम एक कानूनी अमल की संभावना से परे भी एक सोच की तरह देखते हैं कि लोगों को यह याद पड़े कि भयानक भ्रष्टाचार के लिए दसियों हजार करोड़ खर्च करके गंगा को साफ करने का एक धार्मिक-भावनात्मक अभियान तब तक किसी काम का नहीं है, जब तक उसमें गंदगी को रोजाना जोडऩा न घटे। जब तक सरकार और समाज इन दोनों की नजरों में गंगा पूजा से परे, जिंदा रहने देने लायक इंसान न मान ली जाए, तब तक गंगा का कुछ भला नहीं होना है, और नदियों के किनारे बसे इस देश का भी कोई भला नहीं होना है। जब तक गंगा को एक धार्मिक प्रतीक मानकर उसे एक धार्मिक नारे की तरह बचाया जाएगा, तबतक उसका बचना वैसे ही होगा जैसे कि किसी देवी की प्रतिमा को नौ दिनों तक बचाना होता है, और दूसरी तरफ उसी समाज में जिंदा देवियों के साथ बलात्कार होता है, और उनकी ऑनरकिलिंग होती है। किसी का सम्मान करने के लिए उसके साथ किसी पौराणिक कहानी को जोडऩे की जरूरत नहीं होनी चाहिए, महज एक इंसान को इंसानियत से देखने की सोच काफी हो सकती है, जैसी कि पूरी दुनिया में आदिवासियों की होती है। कुदरत के तमाम हिस्से, जंगल, पेड़, नदी, पहाड़, जमीन, और पशु-पक्षी, इन सबके लिए आदिवासियों का नजरिया पूरी दुनिया में सबसे अधिक लोकतांत्रिक होता है, इंसाफपसंद होता है, और पर्यावरणप्रेमी होता है। इन्हीं आदिवासियों की जमीनों पर आज सरकार से लेकर कारखानेदार तक टूट पड़े हैं, और उनको उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, उनके पेड़ काटे जा रहे हैं, और पेड़ कटने से मिट्टी बनकर नदियों तक पहुंचकर उनमें गाद भर रही है, और पूरी धरती चौपट हो रही है। शहरों से निकली, शहरों में बसी, शहरी सोच में ढली, और शहरियों के लिए फिक्रमंद सरकारें पर्यावरण को बचाने का नारा तो जानती हैं, लेकिन आदिवासी और प्रकृति के बीच के सबसे मजबूत और अनंतकालीन रिश्ते को वे नहीं समझ पातीं। इसलिए उत्तराखंड ने जब न्यूजीलैंड के आदिवासियों की सोच का बखान करते हुए यह फैसला दिया है, तो इसे देखते हुए नदियों को धर्म से परे देखने की जरूरत है, उन्हें इंसानों की तरह देखने की जरूरत है, और संविधान में इंसानों को दिए गए अधिकार इन नदियों को भी देने की जरूरत है। और यह देना कोई देना भी नहीं है, यह तो नदियों और इस कुदरत से अपनी आने वाली हजारों पीढिय़ों के लिए एक बेहतर कल लेना है, और इस लेने की गारंटी के लिए धर्म के अवैज्ञानिक पाखंड से परे एक लोकतांत्रिक-वैज्ञानिक सोच की जरूरत है, और हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ही उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस एक दार्शनिक फैसले को काट नहीं सकेगी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति विश्व जल दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. गंगा यमुना को आखिर उनका सम्मान व अधिकार वापस मिला, सचमुच सतयुग आ रहा है..

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