बिना समझ ज्ञान बेकार

संपादकीय
24 मार्च 2017


भारत में इम्तिहान शुरू होने और नतीजे निकलने शुरू होते ही जगह-जगह से बच्चों की आत्महत्या की खबरें आने लगती हैं। देश में सबसे अधिक कड़े मुकाबले वाली जगहों में से एक आईआईटी में पढ़ाई और मुकाबले के दबाव के चलते हर बरस कुछ छात्र-छात्राएं आत्महत्या कर लेते हैं और छोटी-छोटी स्कूलों में जहां पर बिना अधिक दबाव वाली साधारण पढ़ाई होती है वहां से भी दिल दहलाने वाली ऐसी खबरें आती हैं। इस देश में मनोचिकित्सक और मनोपरामर्शदाताओं का अकाल है और आज इस विशेषज्ञता के लिए चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान की जो पढ़ाई जरूरी है, वहां पर सीटों का ही अकाल है, इसलिए आने वाले दशकों तक यह कमी खत्म नहीं होने वाली है। ऐसे में देश के बच्चों और नौजवान पीढ़ी के सामने मौजूदा शिक्षानीति और मां-बाप की उम्मीदों नाम के दो पाटों के बीच पिसना ही नियति है। इसके अलावा जरा-जरा सी बात पर मां-बाप से नाराज होकर कुछ बच्चे आत्महत्याएं कर रहे हैं जिनमें मोबाईल फोन न मिलने, या फोन पर अधिक बातचीत से रोके जाने पर बच्चे ऐसे फैसले ले रहे हैं।
ऐसी खबरें जब आती हैं तो हमें यह लगता है कि इन खबरों को कितना छापें, कितना न छापें? क्या ऐसी खबरों से और बच्चों को ऐसा आत्मघाती फैसला लेने की राह दिखने लगेगी या फिर उनके मां-बाप और उनके शिक्षक ऐसी खबरों से चौकन्ने होकर अपना व्यवहार सुधारेंगे और अपने बच्चों की बेहतर देखभाल करेंगे? यह फैसला मुश्किल होता है और हम ऐसे खतरों के कम होने के आसार देख भी नहीं रहे। एक तरफ स्कूल और कॉलेज, तकरीबन हर जगह पढ़ाई का मतलब परीक्षा हो गया है और परीक्षा का मतलब अगली पढ़ाई के लिए दाखिला-परीक्षा हो गया है। पढ़ाई से किसी का ज्ञान बढऩा अब जरूरी नहीं रह गया, अब अगर बच्चे बड़ी-बड़ी, ऊंची और महंगी पढ़ाई तक पहुंचने का रास्ता बनाते चलते हैं तो मां-बाप भी उनसे खुश रहते हैं और स्कूलों में शिक्षकों के बीच भी बच्चों की साख ठीक बनी रहती है। कुछ मां-बाप जो इससे भी अधिक महत्वाकांक्षी हैं और जिंदगी में बहुत बुरे-बुरे समझौते करके, गलत काम करके अपने बच्चों को 'आगे बढ़ाने' में लगे रहते हैं, अभी कुछ बरस पहले  छत्तीसगढ़ में ही चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में जालसाजी करते कुछ बच्चे पकड़े गए। लाखों रूपये खर्च करके जब कुछ मां-बाप अपने बच्चों के लिए पर्चे खरीदने का इंतजाम कर लेते हैं, नंबर बढ़वाने का इंतजाम कर लेते हैं, तो उनसे काबिल जिन हजारों बच्चों का हक छिनता है, वे भी हताशा और निराशा में आत्महत्या की कगार पर पहुंच सकते हैं।
यह एक बहुत भयानक नौबत है जहां पर दुनिया की भौतिक सुविधाओं को, इम्तिहानों में कामयाबी को ही सब कुछ मान लिया गया है और शायद ही कुछ फीसदी मां-बाप अपने बच्चों को एक बेहतर इंसान बनाने में अधिक दिलचस्पी लेते हैं। जिंदगी और दुनिया में जिन दूसरी बातों का अधिक महत्व होना चाहिए वे तमाम हाशिए पर हो गई हैं।
कुछ बरस पहले ऐसे एक छात्र ने  अपने दो मोबाईल फोन के बाद एक तीसरे मोबाईल की फरमाईश पूरी न होने पर आत्महत्या कर ली और अपने पिता के लिए एक चि_ी छोड़ गया  कि वे बाजार से दूसरा बेटा खरीद लें। ऐसी खबरों के बाद  मां-बाप अपने बच्चों पर कितना काबू करने का हौसला कर पाएंगे? इसलिए जरूरी यह है कि पढ़ाई और मुकाबले से परे हर मां-बाप अपने बच्चों को उनकी जिंदगी की शुरूआत से ही सही और गलत, जरूरी और गैरजरूरी, नैतिक और अनैतिक की नसीहत देते चलें, और ऐसा करते हुए उन्हें अपनी खुद की जिंदगी को एक मिसाल के तौर पर बच्चों के सामने रखना होगा। इतनी सावधानी रखते हुए मां-बाप अपनी खुद की जिंदगी को भी बेहतर बना पाएंगे क्योंकि वे अगर बच्चों को गुड़ खाने से रोकना चाहेंगे तो उन्हें खुद भी गुलगुलों से परहेज करना होगा। यह करना इसलिए जरूरी है कि आत्महत्या से कम भी, जब बच्चे खबरें नहीं बनते हैं और तनाव या कुंठा में जीते हैं, हीन भावना के शिकार हो जाते हैं तो उनकी अपनी जिंदगी आगे जाकर बहुत तकलीफदेह रहती है। इसलिए बच्चों का सिर्फ आत्महत्या न करना, और जिंदा रहना काफी नहीं है। जरूरी तो यह है कि बच्चे जिंदगी और दुनिया के लिए अच्छे मूल्यों वाला नजरिया अपने भीतर विकसित कर पाएं, और कामयाबी के भी पहले वे बेहतर इंसान बनने को अधिक जरूरी समझें। मां-बाप को और स्कूल-कॉलेज को यह समझना जरूरी है कि दुनिया के बहुत से महान लोग किताबों के मामले में बहुत असफल रहे, परीक्षाओं में फेल हुए, लेकिन उन पर दुनिया में हजारों किताबें लिखी गईं। किताबों और उम्मीदों, नासमझी और लापरवाही तले अपने बच्चों को दम न तोडऩे दें और पहली कोशिश उन्हें समझदार और बेहतर इंसान बनाने में लगाएं। यह समझना चाहिए कि ज्ञानी और समझदार में से समझदार बेहतर होता है। बिना समझ ज्ञान किसी काम का नहीं होता।

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