जिंदा कौमों वाला लोहिया का बयान चुनाव व्यवस्था में महज कागजी

संपादकीय
25 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तान के बहुत से लोग उबले पड़े हैं कि ऐसी साम्प्रदायिक सोच रखने वाले को मुख्यमंत्री बनाया गया है। इसे लेकर हिटलर की मिसाल भी दी जा रही है, और कुछ ऐसे कार्टून-पोस्टर बनाए गए जिन्हें फेसबुक ने भी हिटलर के चेहरे की वजह से हटा दिया। कुछ ऐसा ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जीतकर आने के बाद हुआ कि अमरीका के दर्जनों शहरों में उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए और लोग इन नारों की तख्तियां लिए हुए थे- ये मेरा राष्ट्रपति नहीं है।
लोकतंत्र में हर बात की एक सीमा होती है। उत्तरप्रदेश सहित बाकी राज्यों के चुनाव के पहले हर राजनीतिक दल और हर विचारधारा के सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के पास अपने-अपने प्रचार का पूरा मौका था। और ऐसे ही मौके के चलते उत्तरप्रदेश में एक सुनामी की तरह भाजपा आई, लेकिन पास के पंजाब में वही भाजपा अपने बड़े भागीदार अकाली दल के साथ मानो सुनामी में बह गई, और विपक्ष में भी दूसरे नंबर पर पहुंची। ऐसे में लोकतंत्र में सिवाय इसके और कोई विकल्प नहीं है कि निर्वाचित व्यक्ति को, या कि निर्वाचित लोगों के बहुमत के छांटे हुए किसी व्यक्ति को सरकार पर काम करने का मौका दिया जाए। वह व्यक्ति खराब हो सकता है, बहुत खराब हो सकता है, लेकिन उसकी खराबी भी अगर उसे चुनाव लडऩे के लिए अपात्र नहीं ठहराती, तो फिर जीतकर आने के बाद उसे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, या मंत्री बनने के लिए भला कैसे अपात्र ठहराया जा सकता है? लोगों को यह लग सकता है कि यह देश की साम्प्रदायिक-सद्भावना के खिलाफ है, देश के लिए खतरा है, देश का लोकतंत्र इससे खत्म हो सकता है, लेकिन ये तमाम बातें मतदाता के फैसले के पहले तक की हैं। एक बार मतदाता ने जब चुन लिया, तो लोगों को अपनी हसरतों को विचार के रूप में ही सामने रखने की संभावना मिलती है, और भारत में वह चल भी रहा है।
अमरीका सहित पश्चिम के बहुत से अखबारों ने योगी को मुख्यमंत्री बनाने को बहुत बड़ा खतरा बताते हुए इसे मोदी से निराशा बताई है, लेकिन देश के भीतर के ही अखबारों के विचार क्या मायने रखते हैं? और फिर यह देखें कि चुनाव में अखबार क्या मायने रखते हैं, मीडिया क्या मायने रखता है, तो इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो अमरीका में ट्रंप का जीतकर आना है क्योंकि ट्रंप तो वहां हिलेरी क्लिंटन और मीडिया दोनों से ही एक साथ लड़ रहे थे, और इस बात को बार-बार बोल भी रहे थे। हम अमरीकी मीडिया के रूख के खिलाफ नहीं हैं, उसने दबे-छुपे कुछ नहीं किया, उसने खुलकर ट्रंप का विरोध किया, और उस विरोध के बावजूद अमरीकी जनता ने एक ऐसे ट्रंप को राष्ट्रपति बना दिया जिसे लेकर उसे वोट देने वाले मतदाता भी अगले ही दिन हक्का-बक्का रह गए। हो सकता है आने वाले दिनों या हफ्तों में योगी के ऐसे फैसले रहें जिन्हें लेकर उत्तरप्रदेश की जनता को अफसोस हो कि यह उसने किसे चुन लिया था, किस पार्टी को चुन लिया था, लेकिन लोकतंत्र में जनता के पास विकल्प सीमित हैं। वह मतदान के दिन घर बैठकर बाद में पांच बरस झींक सकती है, वह गलत पार्टी या नेता को चुनकर पांच बरस तक मलाल कर सकती है, लेकिन वह एक बार चुन लेने के बाद किसी को वापिस नहीं बुला सकती, हटा नहीं सकती। इसलिए लोहिया की कही हुई यह बात भारतीय संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में महज एक भावना है कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। यह बात चुनावी व्यवस्था के ढांचे में किसी काम की नहीं है, और उत्तरप्रदेश के आने वाले बरस ही वहां के मतदाताओं को खुशी या गम दे सकते हैं कि उन्होंने किसे मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता बनाया। फिलहाल तो लोगों को चुपचाप इंतजार करना है अगले चुनाव का, और तब तक वे चाहें तो अपने विचारों को लोहिया के कहे मुताबिक चारों तरफ उठा सकते हैं, ताकि जनजागरूकता कम से कम पांच बरस बाद तैयार रहे।

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