म्युनिसिपलों की क्रेडिट रेटिंग में छत्तीसगढ़ का नाम भी नहीं

संपादकीय
27 मार्च 2017


केन्द्र सरकार ने देश के शहरों की म्युनिसिपलों की क्रेडिट रेटिंग जारी की है जिनके मुताबिक ये शहर अपने आपको स्मार्ट बनाने के लिए बाजार से कर्ज उठाने के लिए बॉंड जारी कर सकते हैं। अभी देश में जिन पांच सौ शहरों को स्मार्ट सिटी मिशन, और ऐसी ही एक दूसरी अमृत योजना के लिए छांटा गया है, उनमें से ऊपर के 94 पाए गए शहरों की क्रेडिट रेटिंग जारी हुई है। देश के 55 शहर ऐसे पाए गए हैं जिन्हें पूंजीनिवेश के लायक दर्जा मिला है और इसके नीचे के शहरों को यह नसीहत दी गई है कि वे अगले एक बरस में अपनी हालत को सुधारें ताकि वे क्रेडिट रेटिंग पैमानों पर बेहतर साबित हो सकें। छत्तीसगढ़ का इस लिस्ट में हाल यह है कि जिन 14 राज्यों के 94 शहर इस लिस्ट में हैं, उनमें से छत्तीसगढ़ का कोई नहीं है, और प्रदेश का नामोनिशान नहीं है। दूसरी तरफ नया राज्य तेलंगाना, सबसे गरीब समझा जाना वाला राज्य पश्चिम बंगाल, छोटा राज्य गोवा, मिजोरम, झारखंड, ओडिशा, ऐसे कई राज्यों के शहर इस लिस्ट में हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पर राज्य बनने के बाद के इस डेढ़ दशक में हजारों करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। रायपुर के अलावा बिलासपुर ऐसा शहर है जहां लंबे समय से नगरीय प्रशासन मंत्री चले आ रहे अमर अग्रवाल विधायक हैं और वहीं बसे हैं, और वहां पर शहर की योजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च भी हुआ है। यही हाल दुर्ग-भिलाई का है, जहां खर्च खूब हुआ है, ताकतवर मंत्री इन तीनों शहरों में बसते हैं, लेकिन नगर निगम की अपनी हालत खस्ता बनी हुई है। क्रेडिट रेटिंग के पैमानों पर शहरों की म्युनिसिपलों को इसलिए आंका जाता है कि अपने विकास के लिए कौन-कौन से शहर कर्ज पाने की क्षमता रखते हैं, इसे देखा जाए, और इस आधार पर शहरों को बॉंड लाने की इजाजत दी जाए। अभी की लिस्ट में हालत यह है कि बॉंड के लिए अपात्र माने गए करीब 45 शहरों के नीचे भी छत्तीसगढ़ का नाम नहीं है।
छत्तीसगढ़ में म्युनिसिपलों के साथ दिक्कत यह है कि राज्य सरकार उन पर अपना काबू कम करना ही नहीं चाहती। जब किसी स्थानीय प्रशासन को अपने पैरों पर खड़ा होना है, तो उसे कई तरह की स्वायत्तता भी मिलनी चाहिए। उसे अपने खर्च करने, अपनी कमाई के साधन जुटाने, और अपनी पसंद के टैक्स लगाने की छूट मिलनी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के म्युुनिसिपल सरकार द्वारा मिलने वाली मदद के इंतजार में बरस-दर-बरस गुजार देते हैं, और राज्य शासन के रहमोकरम के मोहताज बने रहते हैं। दूसरी तरफ यहां की कई म्युनिसिपलों में ऐसी पार्टी के महापौर चुनकर आए जो कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के विपक्षी रहे, और नतीजा यह हुआ कि उनके साथ सरकार द्वारा तैनात कमिश्नरों का टकराव ही चलते रहा, या फिर म्युनिसिपल के भीतर राजनीतिक पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे से निपटने में लगे रहे, शहर की दिक्कतों से निपटने के बजाय। सरकार की सोच में भी स्थानीय निकायों को आजादी देना नहीं है, और कई बार तो राज्य शासन के स्तर पर बड़ी महंगी-महंगी मशीनें खरीदकर म्युनिसिपलों पर थोप दी जाती हैं, जो कि कबाड़ का बोझ बने हुए अखबारों में खबरें बनती रहती हैं।
दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्र में स्थानीय निकायों को इतना महत्व मिलता है कि कई जगहों पर पुलिस विभाग भी उनके मातहत काम करता है। वे स्थानीय स्तर पर सरकार का दर्जा रखते हैं, और वहां से निकला हुआ नेतृत्व आगे चलकर प्रदेश और देश के भी काम आता है। इसके अलावा स्थानीय जरूरतों को समझते हुए जब म्युनिसिपल अपने स्तर पर फैसले लेने और काम चलाने की आजादी रखते हैं, तब फिर वे निर्वाचत करने वाली जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भी पूरी कर सकते हैं। आज स्थानीय निकायों को छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में केवल राज्य शासन के अनुदान, या अलग-अलग मद में उनसे दूसरे किस्म की मंजूरी पर जिंदा रहने की मजबूरी है। इसके चलते हुए म्युनिसिपलों का अपना खुद का ढांचा लापरवाह और जर्जर हो गया है। जब हर काम के लिए राज्य के मंत्रालय जाकर खड़ा रहना है, तो निर्वाचित नेता भी अपनी जिम्मेदारी से कतराने लगते हैं। यह सिलसिला किसी शहर की म्युनिसिपल के दफ्तर में सुधरने का नहीं है, इसके लिए राज्य शासन के स्तर पर इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है कि स्थानीय नेतृत्व पनपने दिया जाए, न कि उससे डरा जाए, उसे दबाया जाए, और उसे काबू पाने के लिए अफसर तैनात किए जाएं। अभी केन्द्र सरकार की क्रेडिट रेटिंग की लिस्ट छत्तीसगढ़ सरकार को हकीकत समझाने के लिए काफी है। ऐसा न होने पर स्थानीय निकाय कमजोर बने रहेंगे, और स्थानीय निकायों की नाकामयाबी की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य सरकार की होगी, जैसी कि आज है।

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