जनता के पैसों पर सत्ता की शान-शौकत नाजायज

संपादकीय
31 मार्च 2017


पंजाब में काम सम्हालते ही कांग्रेस के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा कि मंत्री गाडिय़ों पर लालबत्ती नहीं लगाएंगे। इसके अलावा उन्होंने उद्घाटन, शिलान्यास, और भूमिपूजन के पत्थरों पर मंत्री-मुख्यमंत्री के नाम लिखवाने को भी बंद किया कि जनता का पैसा जनता को समर्पित। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी के तौर-तरीके भी ऐसे ही किफायत के रहते हैं, लेकिन बंगाल की परंपरा ही वामपंथियों के वक्त से सादगी और किफायत की रहते आई है, और त्रिपुरा में तो एक वामपंथी मुख्यमंत्री ऐसे भी थे जो कि अपने कपड़े खुद धो लेते थे, और उन्हीं के बंगले में राज्य के मुख्य सचिव भी रहते थे, और दोनों एक साथ मंत्रालय जाते-आते थे। त्रिपुरा में एक माक्र्सवादी मुख्यमंत्री की पत्नी ऑटो रिक्शा पर सरकारी नौकरी करने आती-जाती थी। अभी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों से कहा है कि वे बंगलों की साज-सज्जा पर खर्च न करें और सादगी से रहें।
इन पांच राज्यों के चुनावों में जो नतीजे सामने आए उनमें अलग-अलग राज्य में अलग-अलग बातें तो दिखीं, लेकिन जो एक बात सिर चढ़कर दिखी, वह थी कि जनता ने पांचों जगहों पर सत्तारूढ़ पार्टी को हरा दिया, और दो राज्य तो ऐसे थे जहां मुख्यमंत्रियों को ही हरा दिया। इससे अगर देश के बाकी राज्य कोई सबक ले सकते हैं, तो उन्हें लेना चाहिए, क्योंकि चुनाव में जीत-हार तो चलती रहती है, जब सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के मुखिया, मुख्यमंत्री-मंत्री, या उनके मातहत काम करने वाले अफसर राजसी और सामंती अंदाज में शान-शौकत पर जनता का पैसा खर्च करने लगते हैं, तो जनता के मन में उसे लेकर नफरत खड़ी होने लगती है। और भारतीय लोकतंत्र में चुनाव में अब जनता अपने परंपरागत रूख और पसंद से हटकर कई नई किस्म की सोच के आधार पर भी वोट देने लगी है। दिल्ली में जिस तरह सादगी के मुद्दे पर चुनाव लड़कर आम आदमी पार्टी ने उस राज्य में चल रहे दो पार्टियों के परंपरागत मुकाबले को ही खारिज कर दिया, और कल के लड़कों की पार्टी, आम आदमी पार्टी को सत्ता दे दी थी। अभी के पंजाब के नतीजों में भी अकाली-भाजपा गठबंधन तीसरे नंबर पर रहा, और केजरीवाल की किफायत वाली पार्टी वहां मुख्य विपक्षी दल बन गई है।
हमारा मानना है कि अब जनता अपने अधिकारों को लेकर अधिक आक्रामक हो चली है, और कोई भी पार्टी, कोई भी सत्ता, अब जनता को बेवकूफ मानकर नहीं चल सकतीं। जनता के मन में गाडिय़ों के काफिले, बड़े-बड़े बंगले, और फिजूलखर्ची के खिलाफ बड़ी हिकारत सुनाई पड़ती है। यह बात ठीक है कि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं होता, और बहुत से मुद्दों की एक जटिल पसंद-नापसंद जनता के फैसले तय करती है, लेकिन जो नेता या पार्टी इसे लेकर सावधान न रहें, उनका बाकी का अच्छा किया कराया भी पानी में मिल सकता है। हमारा ख्याल है कि गांधी के इस देश में, और आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रहते हुए, सत्ता पर आए लोगों को अधिक से अधिक किफायत बरतनी चाहिए, इसके बिना न तो देश का भला है, और न ही लोगों का खुद का भला हो सकता है। लालबत्तियों के सायरन-चीखते काफिले लोगों के मन में नफरत पैदा करते हैं, और चूंकि इसके बावजूद कुछ लोग चुनाव जीत जाते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि जनता इसे बर्दाश्त कर लेती है। कल के दिन ऐसे ही मुद्दों पर बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव हार भी सकते हैं। बेहतर यही है कि जनता का पैसा बर्बाद न किया जाए, सादगी बरती जाए, और लोकतंत्र का सम्मान किया जाए।

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