छत्तीसगढ़ में स्मार्टफोन के ऐसे विस्तार के साथ आने वाली चुनौतियां

संपादकीय
7 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ सरकार के कल के बजट में सबसे आसानी से समझ और नजर आने वाली बात पैंतालीस लाख लोगों को स्मार्टफोन और इंटरनेट तक पहुंच देने की है। पैंतालीस लाख इस छोटे राज्य के लिए एक बड़ी गिनती है, और सवा दो करोड़ की आबादी में गरीबी की रेखा के नीचे के हर परिवार को फोन और नेट मिल जाएगा। सरकार का यह कहना है कि उसकी बहुत सारी योजनाएं, और बहुत सी सहूलियतें इंटरनेट के रास्ते आसानी से पहुंची जा सकती हैं।
आज हालांकि फोन और इंटरनेट बहुत बड़ी बात नहीं हैं, लेकिन फिर भी इस देश में एक डिजिटल-डिवाइड चले आ रहा है जिसे पाटने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के इस एक काम से हो सकता है कि गरीबों की पहुंच एक स्मार्टफोन और उससे जुड़ी हुई सुविधाओं तक हो जाए, और उसका काम आसान हो। साथ ही हम कम्प्यूटर या इंटरनेट को कोई तिलस्मी ताबीज मानने से इंकार करते हैं कि यह औजार अपने आपमें कोई करिश्मा कर सकता है। आज जब सरकार के लिए सबसे अधिक कमाई करने वाले रजिस्ट्री ऑफिस और आरटीओ ऑफिस में टैक्स जमा करने का काम भी कम्प्यूटर और सर्वर की खामी से कई-कई दिन ठप्प रहता है, तो सरकारी रियायत देने के काम में इनके ठीक रहने की क्या गारंटी हो सकती है? और फिर सरकार इस बात पर आत्मसंतुष्ट हो सकती है कि उसने अधिक से अधिक सुविधाओं को ऑनलाईन कर दिया है, और हकीकत में ये काम न करें।
लेकिन हम छत्तीसगढ़ सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना की संभावनाओं को नहीं नकारते हुए इससे जुड़ी तीन बातों को याद दिलाना चाहते हैं। पहली बात यह कि डिजिटल ट्रेनिंग के बिना ऐसे औजार लोगों के काम के नहीं रहेंगे। दूसरी बात यह कि डिजिटल या साइबर निगरानी के बिना साइबर-जुर्म बढ़ते चले जाएंगे, लोग लुटते चले जाएंगे, और लुटेरे भाग जाने के बाद सरकार देखती रह जाएगी। तीसरी बात यह कि डिजिटल-जुर्म सामने आने पर भी क्या यह छत्तीसगढ़ सरकार किसी साइबर-जांच की क्षमता रखती है? आज की हकीकत तो यह है कि पिछले कई बरसों में प्रदेश का पहला साइबर-थाना ही सरकार नहीं खोल पाई है, और उसकी आज की जांच की ताकत दस-बीस बरस पुराने मोबाइल फोन तक सीमित है। किसी नई टेक्नॉलॉजी के साथ यह सरकार नहीं चल पा रही, और पुलिस मुख्यालय और मंत्रालय के बीच साइबर-मंजूरी की फाईलें मानो घोंघे की पीठ पर बंधी हुई चल रही हैं।
अभी पिछले ही हफ्ते छत्तीसगढ़ में एक ऐसी ठगी हुई है जिसमें किसी ने फोन करके आधार कार्ड नंबर पूछा, और उससे खाते से 63 हजार रुपये निकाल लिए। केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक आधार कार्ड को अनिवार्य करने के लिए दीवानगी की रफ्तार से जुटी हुई हैं। लेकिन आधार कार्ड से जुड़ी हुई अनगिनत जानकारियों की हिफाजत कैसे होगी, यह आज केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं समझा पा रही है। दूसरी तरफ पूरे देश में लगातार लोगों के बैंक खातों से ठगी चल रही है, और ऐसे जुर्म के खिलाफ आम तो आम, खासे पढ़े-लिखे लोगों में भी कोई चौकन्नापन नहीं है। इसलिए जब छत्तीसगढ़ के हर साक्षर-अनपढ़ हाथ में एक मोबाइल फोन होगा, और उससे उसके हक की बहुत सी सहूलियतें, और रियायतें जुड़ी रहेंगी, उसकी मजदूरी या उसका बैंक खाता उससे जुड़ा रहेगा, उसे मोबाइल बैंकिंग की तरफ धकेला जाएगा, तो फिर उसके सामने खड़े खतरों से बचाव का जिम्मा भी छत्तीसगढ़ सरकार का ही होगा।
इसलिए लोगों को डिजिटल कामकाज में सावधानी सिखाने की पहली जरूरत है, और दूसरी जरूरत सरकार के अपने एक ऐसे खुफिया ढांचे की है जो कि फोन, नेट, और कम्प्यूटर से होने वाले जुर्म पर नजर रख सके। तीसरी, लेकिन शायद आखिरी नहीं, जरूरत यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार फोन या नेट से होने वाले अपराध की तुरंत जांच करने की अपनी क्षमता विकसित करे। हमारा मानना है कि आज सरकार ने पैंतालीस लाख स्मार्टफोन-इंटरनेट कनेक्शन के लिए जो बजट रखा है, उसका ही एक हिस्सा इन तीन क्षमताओं को विकसित करने के लिए रखना चाहिए, क्योंकि प्रदेश के पुलिस विभाग और राज्य शासन के बीच कई बरसों में मिलकर भी एक साइबर-थाना खड़ा करने की सहमति नहीं जुट पाई है। सरकार को किसी भी बड़ी योजना के साथ-साथ ऐसी सावधानी के पहलुओं को अनिवार्य रूप से जोड़ लेना चाहिए क्योंकि प्रदेश में सिर्फ पैंतालीस लाख औजार नहीं बढऩे वाले हैं, ठगों और जालसाजों के लिए पैंतालीस लाख संभावनाएं भी बढऩे वाली हैं।

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