अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आरक्षण पर कुछ चर्चा हो जाए

संपादकीय
8 मार्च 2017


आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दुनिया भर में महिलाओं के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जा रही हैं, और भारत भी इसमें पीछे नहीं है। ट्विटर पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लिखा है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए। इस बात से याद पड़ता है कि इस देश में महिला आरक्षण की चर्चा भी अब साल में एक दिन भी यह अकेली पार्टी कर रही है, और खुद महिलाएं इस मुद्दे को भूल सी गई हैं, या कि समाज ने उन्हें भूलने को मजबूर कर दिया है। जो भी हो हम इस मुद्दे को इसलिए बार-बार उठाते हैं कि यह हमें देश में लैंगिक समानता का एक पैमाना दिखता है कि यह समाज महिलाओं को उनका हक देना चाहता है या नहीं।
मजे की बात यह है कि पूरे देश में पंचायतों और म्युनिसिपलों में वार्ड और पंच-सरपंच से लेकर महापौर तक के लिए महिला आरक्षण लागू है, और इनमें से हर जगह जाति के आधार पर आरक्षित तबकों में भी महिलाएं मिल जाती हैं, जीतकर आती हैं, और धीरे-धीरे स्थानीय शासन का काम सीख और सम्हाल रही हैं। जब एक विधानसभा सीट के भीतर ऐसी सैकड़ों महिलाएं छोटे-छोटे वार्ड में भी मिल जाती हैं, तो फिर पूरे विधानसभा सीट में एक महिला क्यों नहीं मिलेगी जो कि विधायक बनने के लायक हो? इसी तरह एक लोकसभा सीट में औसतन सात-आठ विधायक होते हैं, और इनके बीच से सांसद बनने लायक एक महिला नहीं मिल पाएगी, यह सोचना एक बहुत ही पुरूषवादी हिंसक सोच का नतीजा है।
आज दिक्कत यह है कि भारत की राजनीति में जिन पार्टियों की मुखिया महिलाएं हैं, उनके भीतर भी महिला आरक्षण को लेकर कोई हसरत नहीं दिखती। सोनिया गांधी से लेकर मायावती, ममता बैनर्जी, और अब शशिकला तक कई महिलाएं बड़ी-बड़ी पार्टियों की मुखिया हैं, लेकिन संसद के भीतर महिला आरक्षण का नाम भी कोई नहीं लेतीं। जब तक यह तस्वीर नहीं बदलेगी, भारतीय राजनीति से बेइंसाफी खत्म नहीं होगी। इसी किस्म की एक दूसरी बेइंसाफी एक दूसरे आरक्षण से जुड़ी हुई है, और इसे लेकर भी हम बार-बार लिखते हैं। जातिगत आरक्षण के कोटे के भीतर के मलाईदार तबके को जब तक आरक्षण की पात्रता से हटाया नहीं जाएगा, तब तक उन तबकों के गरीब और कमजोर, आरक्षण के सचमुच के हकदार लोगों को मौका नहीं मिल पाएगा। जब दलित या आदिवासी, या ओबीसी के छात्र-छात्रा या बेरोजगार नौजवान किसी कुर्सी को पाने की कोशिश करते हैं, तो उनका मुकाबला अपने ही तबके के उन लोगों से होता है जिनके मां-बाप बड़े-बड़े सरकारी या राजनीतिक ओहदों पर रहते आए हैं, और वे आर्थिक और सामाजिक ताकत से इतने मजबूत हैं कि किसी मुकाबले की उनकी तैयारी के सामने गरीब दलित-आदिवासी के ठहरने की संभावना खत्म सी हो जाती है। लेकिन क्रीमीलेयर को हटाने के इस मुद्दे को सत्ता पर काबिज तबकों ने इसलिए बड़ी सहूलियत से भुला दिया है क्योंकि अगर इनको आरक्षण के फायदों से हटाया जाएगा, तो सारे सांसद-विधायक, अफसर-जज, संपन्न लोग अपने बच्चों के लिए आरक्षण का फायदा खो बैठेंगे। इसलिए जिन सांसदों-विधायकों और अफसरों को क्रीमीलेयर हटाने के न्यायसंगत कारण बताने हैं, वे सारे के सारे अपने निजी हित में इसके खिलाफ हैं। यह सैद्धांतिक रूप से एक बहुत बड़ा हितों का टकराव है, और पता नहीं सुप्रीम कोर्ट में कोई जाकर इसे साबित क्यों नहीं कर पा रहे।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय महिला आरक्षण दिवस पर सूझे इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए, और इन दोनों किस्म के आरक्षण पर अलग-अलग मंचों पर लोगों को खुद ही बात करके ऐसा जनमत बनाना चाहिए कि महिला आरक्षण भी लागू हो, और क्रीमीलेयर के लोग आरक्षण के फायदों से बाहर भी हों। हमको सीपीएम के 33 फीसदी के सुझाव पर हैरानी होती है कि कम से कम वामपंथियों को तो महिलाओं को आधा हक दिलाने की वकालत करनी चाहिए थी।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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