एक दिन पेट्रोल-डीजल बिना रहने के लिए जरूरी है...

संपादकीय
26 मार्च 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज अपने मन की बात में लोगों से हफ्ते में एक दिन डीजल-पेट्रोल इस्तेमाल न करने की अपील की है। यह वैसे तो एक अच्छी सलाह है जिससे देश की विदेशी मुद्रा बचेगी, सड़कों पर भीड़ बचेगी, प्रदूषण घटेगा, और पैदल या पैडल की वजह से लोगों की सेहत भी बेहतर होगी। जो लोग सार्वजनिक साधनों पर चलेंगे, उनकी बचत भी होगी। लेकिन भारत के संदर्भ में इस सलाह में दो बड़ी बातें आड़े आती हैं, और ये दोनों ही बातें सरकारों से जुड़ी हुई हैं, जिनके सुलझाए बिना इस सलाह पर अमल करना अधिक मुमकिन नहीं है।
लोगों को कामकाज के लिए बाहर निकलना ही होता है, और अगर मेट्रो या बस जैसी सहूलियत न हो, तो लोगों को अपने ही दुपहिए या चौपहिए पर जाना पड़ता है। ब्रिटेन जैसे विकसित और संपन्न देश में करोड़पति भी अपनी मर्जी से साइकिलों पर निकल पड़ते हैं, और ऐसा हाल योरप के बाकी देशों में भी है, और अमरीका में भी है। इन देशों में ट्रेन से लेकर ट्राम और बसों तक साइकिलों को लेकर जाने की सुविधा रहती है, और लोग एक देश से दूसरे देश साइकिल ले जाते हैं, और वहां उतरकर सीधे रवाना हो जाते हैं। हिन्दुस्तान तो ऐसा गरीब देश है जहां पर आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजबूरी में साइकिल चलाता है, और उसे तो ऐसी नसीहत की जरूरत भी नहीं है। लेकिन साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित सड़कों की जरूरत जरूर है जो कि हिन्दुस्तान में बिल्कुल भी नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि देश की एक सबसे प्रमुख पर्यावरण विशेषज्ञ सुनीता नारायण कुछ बरस पहले दिल्ली में साइकिल से अपनी दफ्तर जा रही थीं, और एक कार उन्हें मारकर भाग निकली थी। बुरी तरह जख्मी हालत में वे अस्पताल में रहीं। जब सड़कों पर बड़ी गाडिय़ों की रफ्तार पर काबू नहीं होगा, तब तक साइकिल चलाने वाले लोग कुचले जाते रहेंगे, और ऐसे खतरे लोगों को साइकिल के इस्तेमाल से रोकते हैं।
दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में यह देखा है कि मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर दिल्ली की मेट्रो और कोलकाता की मेट्रो तक, जहां-जहां सार्वजनिक परिवहन लोगों को मिलता है, लोग उसका खूब इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जब शहरीकरण के ढांचे में बसों या मेट्रो का इंतजाम नहीं होता है, तो लोगों की आदत अपनी गाडिय़ों पर निर्भर रहने की होने लगती है, और उसके बाद उनसे बसों पर चलने की उम्मीद बेकार रहती है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को एक मिसाल की तरह देखते हैं, और पिछले सोलह बरसों के राज्य के अस्तित्व में इस शहर पर हजारों करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। लेकिन सार्वजनिक परिवहन के लिए बसों की सुविधा आज भी बहुत सीमित है, और शहर के कई हिस्सों में बसों के भरोसे नहीं जाया जा सकता। ऐसे में लोग निजी गाडिय़ों पर मजबूर होते हैं। दूसरी तरफ रायपुर शहर प्रदूषण में देश और दुनिया में सबसे ऊपर के शहरों में आता है, और प्रदूषण में एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर गाडिय़ों से निकलने वाला धुआं भी है। इसलिए हिन्दुस्तानी शहरों को एक बड़ी प्राथमिकता के आधार पर सार्वजनिक परिवहन को बड़े घाटे के साथ भी बढ़ावा देना होगा, और जैसे-जैसे लोगों को इस ढांचे पर भरोसा होते जाएगा, वैसे-वैसे घाटा दूर भी होता जाएगा। दूसरी तरफ दुनिया में कहीं भी शहरों के सार्वजनिक परिवहन को नफे-नुकसान से जोड़कर नहीं देखा जाता है, क्योंकि इससे लोगों की सेहत, पर्यावरण, लोगों का वक्त, और देश की उत्पादकता इन सभी का बड़ा फर्क पड़ता है।
मोदी ने चूंकि यह बात छेड़ी है इसलिए उनकी सरकार को यह पहल करनी चाहिए, और हर राज्य के बड़े शहरों को यह बढ़ावा देना चाहिए कि राज्य सरकारें बसों का जाल बिछाएं। आज भी केन्द्र सरकार की ऐसी योजना है और छत्तीसगढ़ की कुछ शहरों में ऐसी बसें चल भी रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में ही ऐसे शहर हैं जहां केन्द्रीय पैसों से आई हुई बसें महीनों से खड़ी हुई हैं, और सरकार उसे चलाने का इंतजाम नहीं कर पा रही है। ऐसी सारी दिक्कतों को दूर करके तेजी से बसों को बढ़ाना पड़ेगा, तभी लोगों का पेट्रोल-डीजल का निजी गाडिय़ों का खर्च थमेगा। और फिर साइकिलों को बढ़ावा अगर देना है, तो सड़कों को सुरक्षित बनाना पड़ेगा, जो कि आज बिल्कुल भी नहीं है। हिन्दुस्तानी सड़कों पर दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें दुनिया में सबसे अधिक हैं, और ऐसे में कोई साइकिल चलाने की हिम्मत नहीं कर सकते, जब तक कि साइकिल चलाना उनकी मजबूरी न हो।

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