एक-एक कर लोकतांत्रिक संस्थाओं में गिरावट के खतरे

संपादकीय
9 मार्च 2017


साल 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में अभी सुप्रीम कोर्ट का ताजा रूख यह है कि लालकृष्ण अडवानी, उमा भारती, कल्याण सिंह जैसे बड़े नेताओं पर मुकदमा आगे चले। अभी यह मामला उत्तरप्रदेश की जिला अदालत से लेकर, लखनऊ हाईकोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट के बीच फुटबॉल की तरह लात मार-मारकर इधर से उधर फेंका जा रहा है। और इसके जिम्मेदार लोगों में से एक ने भी एक दिन की भी सजा नहीं भुगती है। आजाद भारत के इस सबसे बड़े जुर्म में से एक, जिसकी वजह से बाद में हजारों मौतों की वजह भी बनी, उसकी सुनवाई आगे कैसे बढ़े यही तय नहीं हो पा रहा है, तो इससे भारत की न्याय व्यवस्था का एक अंदाज लगता है कि ताकतवर लोगों के खिलाफ, भावनात्मक मुद्दों पर, सत्ता से जुड़े हुए मामलों पर अदालतें किस तरह अपनी कलम बचाते हुए बैठ जाती हैं। एक तरफ तो अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद तय करने में किसी भी अदालत की दिलचस्पी नहीं दिखती, दूसरी तरफ उस वक्त की राज्य की कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद गिराने की साजिश में जैसी सक्रिय हिस्सेदारी निभाई थी, उसके बावजूद अब तक कोई भी नेता सजा के कई बरस दूर भी नहीं दिख रहे। इसके बाद तो उमा भारती मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री बनती रहीं, कल्याण सिंह मंत्री और राज्यपाल बनते रहे, लालकृष्ण अडवानी देश के दो नंबर के सबसे बड़े मंत्री रहे, और बाकी भी कई लोग सत्ता का सुख भोगते रहे। इसके बाद अब जाकर कोई सजा होगी भी तो उसका क्या मतलब निकलेगा।
भारत की अदालतें बड़े मामलों में बड़ा छोटा हौसला दिखाती हैं, या कि बड़े वकीलों के सामने जजों में झिझक पैदा हो जाती है। नए मुख्य न्यायाधीश ने अभी दो -चार दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचने वाले वकीलों को कहा कि बड़े-बड़े वकील भी कतार में ही आएं, और अपने पैसे वाले मुवक्किलों के लिए बारी से पहले सुनवाई न मांगें। जाहिर है कि अब तक यह सिलसिला चल रहा है कि अदालतें बहुत बड़े वकीलों की बातों को सुनने के लिए आनन-फानन तैयार हो जाती हैं, और जब सुनवाई होती है, तो ऐसे वकीलों को अधिक वक्त भी मिल जाता है। नतीजा यह होता है कि जिन ताकतवर लोगों को अदालत का ध्यान खींचना होता है, वे लोग बड़े से बड़ा वकील करते हैं, और उसका असर वकीलों के कद जितना ही पड़ता है। इसकी एक ताजा मिसाल सुब्रत राय सहारा का मामला है जिनसे सुप्रीम कोर्ट हजारों करोड़ रूपए जमा करवाना चाह रहा है, और सहारा की जमानत आगे बढ़वाने के लिए देश के बड़े-बड़े वकील खड़े होकर अदालत का इतना वक्त खर्च करवाते हैं जितना कि किसी फांसी के फैसले पर भी न लगता हो। सहारा की जमानत एक दिन आगे बढ़ाने के लिए, अदालत के कई मिनट खर्च करवा दिए जाते हैं।
यही वजह है कि भारत की न्याय व्यवस्था पर बहुत से लोगों का भरोसा नहीं रहता है, और लोग अदालत के बाहर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, या बाहुबल की अनौपचारिक अदालतों पर भरोसा करने लगते हैं, जमीन या मकान को खाली करवाने के लिए सुपारी देने लगते हैं। देश के लोगों का पुलिस पर से, सरकार और अदालतों पर से भरोसा खत्म होना फिक्र की बात है। नेताओं पर से भरोसा बहुत हद तक पहले ही खत्म हो चुका है, और बाकी लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख में बड़ी गिरावट आई है, जिसमें मीडिया भी शामिल है। और इसमें छुपा हुआ एक बड़ा खतरा यह है कि जब लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा हटता है, तो लोकतंत्र के नाम पर, लोकतंत्र की निरंतरता के लिए होने वाले चुनाव में वोट डालते हुए भी लोग जिम्मेदारी से काम नहीं लेते। प्रचलित भाषा में लोगों को लगता है कि जब नागनाथ या सांपनाथ में से किसी एक को चुनना है, तो फिर वोट क्यों डाला जाए, या फिर किसी को भी क्यों न डाल दिया जाए। एक-एक करके सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख में गिरावट एक बड़ा नुकसान है जो कि जलती हुई आग की तरह सामने दिख तो नहीं रहा है, लेकिन गलत लोगों की चुनावी जीत उसका एक सुबूत है।

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