नक्सल मोर्चे पर बहादुरी का ईनाम 40-50 रूपये !

संपादकीय
1 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ विधानसभा में गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव के एक सवाल के जवाब में दर्जनों पन्नों की एक लिस्ट दी है कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में पुलिस और सुरक्षा बल जवानों को बारी के पहले पदोन्नति और ईनाम कैसे-कैसे दिए गए हैं। ऐसी पदोन्नति तो गिने-चुने जवानों की हुई है, लेकिन इस लिस्ट में सैकड़ों ऐसे जवान हैं जिन्हें नक्सल मोर्चे पर मुठभेड़ का पुरस्कार नगद दिया गया है, और यह रकम 40-50 रूपये भी है। चूंकि गृहमंत्री ने विधानसभा में यह जवाब दिया है, इसलिए हम सरकारी आंकड़ों पर शक भी नहीं कर रहे, और बीबीसी के संवाददाता ने ऐसे पुलिस वालों से बात भी की है जिन्हें नक्सल मुठभेड़ के बाद 40-50 रूपए पुरस्कार मिला, और वे इसे अपना अपमान मान रहे हैं।
लोगों को याद होगा कि बहुत से प्रदेशों में किसानों को बाढ़ मुआवजा, फसल बर्बादी का किसी और किस्म का मुआवजा, इसी तरह 10-20 रूपये भी मिला है। सरकार में बैठे लोग कभी-कभी कुछ और तरह की राहत राशि भी 10-20 रूपये के चेक बनाकर बांटते हैं। अब छत्तीसगढ़ के इन आंकड़ों के संदर्भ में हम यह देखकर हैरान हैं कि नक्सल प्रभावित जिलों में तैनात पुलिस का अगर इस तरह से अपमान किया जा सकता है, तो फिर बाकी पुलिस के साथ तो और भी बुरा सुलूक हो सकता है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने पंजाब के नामी-गिरामी पुलिस-प्रमुख रह चुके के.पी.एस. गिल को राज्य का सुरक्षा सलाहकार बनाया था, और उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह बताया था कि किस तरह बस्तर में तैनात बड़े-बड़े अफसरों को लाखों रूपए की रिश्वत देकर छोटे पुलिस वाले अपना तबादला नक्सल इलाकों से बाहर करवा लेते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ और भी बहुत कुछ लिखा था, लेकिन बाकी बातें फिर कभी।
राज्य सरकार को तुरंत अपनी दी हुई इस जानकारी के पीछे की वजहों को देखना चाहिए, क्योंकि आज बस्तर या किसी जंगल वाले इलाके में तैनात पुलिस को 50 रूपए में एक महीने मच्छर भगाने की दवा भी नहीं मिलती। ऐसे में अपने कर्मचारियों का मनोबल इस तरह गिराना ठीक नहीं है, और ये आंकड़े अपमानजनक हैं। कुछ जानकार अफसरों का कहना है कि नगद पुरस्कार की यह परंपरा अंग्रेजों के समय से चली आ रही है, और हो सकता है कि यह ईनाम नक्सल इलाकों में बिना नक्सल मुठभेड़, अच्छे कामकाज के लिए दिए गए हों। लेकिन इस तर्क पर भी हमारा मानना है कि एक पुलिस कर्मचारी को 40 रूपये का पुरस्कार देने के लिए जितने तरह के कागज तैयार किए गए होंगे, चेक बनाया गया होगा, या खाते में रकम डाली गई होगी, उसका सरकारी खर्च ही इससे अधिक हो गया होगा। और फिर आज के जमाने में जब 40 रूपए में एक वक्त का नाश्ता ही किया जा सकता है, तब ऐसा पुरस्कार चाहे अंग्रेजों का शुरू किया गया हो, उसे बंद कर देना ठीक है।
लगे हाथों हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि जब पुलिस के सम्मान की बात होती है, तो यह भी सोचा जाना चाहिए कि पुलिस का अपमान रोज कहां-कहां होता है। अफसरों के बच्चे घुमाने से लेकर, अफसरों के कुत्तों को नहलाने तक, पुलिस को कई तरह के अपमानजनक काम में लगा दिया जाता है। राज्य की जनता के पैसों के बेहतर इस्तेमाल के लिए, और पुलिस के सम्मान के लिए यह जरूरी है कि पुलिस का गैर-पुलिसिया इस्तेमाल तुरंत खत्म किया जाए, मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर पुलिस की तैनाती केवल सुरक्षा वजहों से की जाए, और उनका केवल सुरक्षा का काम रहे। शान-शौकत के लिए पुलिस का इस्तेमाल बहुत ही अपमानजनक भी है, और जनता के पैसों की बर्बादी भी है। यह सिलसिला तुरंत थमना चाहिए, और सरकार पुरस्कार की रकम के बारे में बारीकी से सोचे, और या तो रकम बढ़ाए, या ऐसा पुरस्कार खत्म करे।

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