अदालत या सरकार के फैसले और जमीनी हकीकत उल्टी...

संपादकीय
2 अप्रैल 2017


देशभर में बीते कल से हाईवे के किनारे शराब दुकानों और शराबखानों  पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लागू हो गई है, लेकिन इससे बचने के लिए कई राज्य अपने प्रदेश के प्रादेशिक राज्यमार्गों से यह दर्जा हटा ले रहे हैं, ताकि वहां दारू बिकती रहे। राज्य सरकारों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा शराब के धंधे से आता है, और राजमार्गों के किनारे बनी बड़ी-बड़ी होटलों और शराबखानों पर इस अदालती फैसले की वजह से होटल-बार का कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित होने जा रहा है। वैसे तो किसी भी जगह बार का लायसेंस आमतौर पर एक-दो बरस के लिए ही मिलता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि होटल-बार पर पूंजी निवेश करने वाले कारोबारियों का अगर कोई नुकसान होने जा रहा है, तो इसके लिए सरकार या अदालत जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बिना शराबखाने के महंगी होटलों का चलना मुश्किल है और छत्तीसगढ़ में ही इस रोक की वजह से दर्जनों बड़ी-बड़ी होटलें दीवालिया हो सकती हैं। देशभर में यह गिनती दसियों हजार कारोबार तक पहुंचेगी।
अदालत के बहुत से फैसले जाहिरतौर पर जनहित के होते हैं, लेकिन उनको लागू करने की रफ्तार, और उसके तरीके जमीनी हकीकत के साथ मेल नहीं खाते। अब जैसे तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने पुराने इंजनों वाली गाडिय़ों की बिक्री पर एक अप्रैल से रोक की घोषणा कर दी। कारखानों से निकलकर डीलरों तक पहुंच चुकी गाडिय़ों को औने-पौने में दो दिन के भीतर बेचने की कोशिश की गई, और कंपनियों से लेकर डीलरों तक इससे होने वाले नफे-नुकसान के बारे में अदालत ने कोई लचीलापन नहीं दिखाया।  इससे कारोबार की अर्थव्यस्था में एक ऐसा भूचाल आया जिससे हो सकता है कि कई लोग ना उबर सकें। ऐसा ही एक दूसरा फैसला अखबारों के कर्मचारियों के वेतनमान को लेकर है। वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों की सारी याचिकाएं खारिज करते हुए उन्हें कड़ाई से लागू करने को कहा है। यहां पर दो बातें है, एक तो यह है कि समाचार पत्र उद्योग एक निजी कारोबार है, और इसके वेतन-भत्तों को इतनी बारीकी से तय करके वेतन आयोग ने इस कारोबार के अनगिनत प्रकाशनों के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी की है जिन्हें की यह कारोबार नहीं उठा सकता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को इमानदारी और कड़ाई से लागू करने पर कर्मचारियों का जितना भला होगा, उससे कहीं अधिक नुकसान कर्मचारियों का होने जा रहा है। देशभर में अखबार मालिकों ने कई जगह संस्करण बंद कर दिए, और कई जगहों पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, नियमित कर्मचारियों को ठेका-कर्मी बना दिया, और उनकी नौकरी की सुरक्षा खत्म हो गई।
इसी तरह का एक और फैसला यह हुआ है कि महिला कर्मचारी को 6 महीने का प्रसुति अवकाश देने का कानून बना लिया गया है। संसद ने इसे लागू कर दिया है, और अभी से अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों के बीच यह फिक्र खड़ी हो गई है कि क्या इससे लोग महिलाओं को काम पर रखना ही कम कर देंगे? महिलाओं को अधिक अधिकार देने की यह सोच तो अच्छी है, लेकिन यह बाजार की इस हकीकत से मेल नहीं खाती कि किसी संस्थान में महिला कर्मचारियों को रखने के पहले मैनेजमेंट ऐसी प्रसुती के बारे में सोचकर हिचक जाएगा। किसी भी देश में मजदूर के भले के लिए बनाए जा रहे कानून अगर दिखने में आकर्षक हों, और उन्हें लागू करना मुश्किल हो, या की उनकी वजह से लोग किसी खास किस्म के कर्मचारियों को रखने से ही कतराएं, तो उससे समाज का फायदे से अधिक नुकसान होने लगता है।
सुप्रीम कोर्ट के हाईवे के किनारे शराबखाने बंद करने के फैसले से दुर्घटनाओं में कितनी कमी आएगी, यह तो बाद की बात है, लेकिन इससे करीब 10 लाख रोजगार खत्म होने का अंदाज नीति आयोग के जानकार लोगों ने सामने रखा है। अदालत हो या केंद्र सरकार, उनके फैसले जमीनी हकीकत का अंदाज लगाकर ही लिए जाने चाहिए और लागू करने चाहिए।

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