शरणार्थियों से परे भी लोकतंत्र की बातों को समझने की जरूरत

संपादकीय
10 अप्रैल 2017


स्वीडन के प्रधानमंत्री का यह बयान सामने आया है कि वे अपने देश में आकर रह रहे (मुस्लिम) शरणार्थियों को अब तक जिस उदारता के साथ जगह देते आए हैं, ऐसा अब कभी नहीं करेंगे। राजधानी स्टॉकहोम में अभी एक शरणार्थी ने एक ट्रक को हाईजैक कर लिया, और उसे लोगों पर चढ़ा दिया। इसमें कई लोग मारे गए, और देश के भीतर सरकार के खिलाफ बड़ी नाराजगी हुई। योरप के एक-एक करके कई देशों में यह नौबत आ रही है कि जो सरकारें उदारता से शरणार्थियों को जगह दे रही थीं, वे अपने देश के अमन-पसंद लोगों या कि संकीर्णतावादी लोगों की आलोचना की शिकार हो रही हैं। दरअसल इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थी पहुंच रहे हैं कि उनके साथ वहां से आतंकियों के कुछ एजेंट भी अगर आ रहे होंगे तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। और फिर सीरिया या इराक में जो इस्लामी संगठन आतंक का राज कायम रखे हुए हैं, उन लोगों को भी यह बात नहीं जंचती है कि वहां के लोग निकलकर दूसरे देशों में जा बसें, इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर शरणार्थियों के साथ आ गए लोगों में कुछ आतंकी भी हों, और वे योरप के इन देशों में शरणार्थियों के खिलाफ भावना भड़काने के लिए आतंक की ऐसी वारदातें कर रहे हों।
इतनी दूर की इन घटनाओं पर लिखने की हमारी एक वजह यह भी है कि भारत में भी कई देशों के शरणार्थी समय-समय पर आकर बसे हैं, और इनमें से अधिकतर के खिलाफ किसी तरह की कोई नाराजगी नहीं रही है। आजादी के पहले का इतिहास अगर देखें तो ईरान से आए हुए पारसियों ने भी गुजरात से भारत में प्रवेश किया था, और यहां रहने की जगह पाई, कामयाबी पाई, और वे अब किसी भी दूसरे हिन्दुस्तानी से कम नहीं हैं। यहां तिब्बत से आए हुए लोग देश भर में सम्मान के साथ रह रहे हैं, और उनका कहीं भी अपमान नहीं होता है। 1971 की लड़ाई के वक्त बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी भारत आए, और उनके साथ किसी तरह का तनाव नहीं हुआ। आज भी असम जैसे राज्य में जिन बांग्लादेशियों के साथ तनाव की खबरें आती हैं, वे शरणार्थी नहीं है, और अवैध तरीके से भारत में आकर बसे हुए लोग हैं, और उन्हें वापिस भेजने की मांग जरूर उठती है। अभी सबसे ताजा मामला म्यांमार से आए हुए मुस्लिम शरणार्थियों का है जिन्हें कि हिन्दू-बहुल जम्मू के इलाके में बसा दिया गया था, और कश्मीर का यह हिस्सा वैसे भी धार्मिक अलगाव से गुजरते आया है, ऐसे में वहां पर म्यांमार के मुस्लिमों को ठहराना समझदारी का फैसला भी नहीं था, और उनका विरोध हुआ।
एक उम्मीद जो तनाव के बीच से निकलकर आए हुए लोगों से नहीं की जा सकती है, वह यह कि जिस देश में जाकर उन्हें रहने को जगह मिल रही है, उस देश के रीति-रिवाज का इतना सम्मान करें कि वे वहां घुलमिल जाएं। जहां-जहां वैसा होता है, वहां-वहां पर बाहर से आए हुए लोगों को दिक्कत नहीं होती है, वरना दूसरे देशों की क्या बात है, भारत के भीतर ही ओडिशा से मारवाडिय़ों को मारकर भगाया गया था। यही बात समाज में नसीहत की तरह ली जानी चाहिए कि जहां रहना है वहां पर स्थानीय परंपराओं, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय कानून का सम्मान करना चाहिए। मुस्लिम देशों से योरप पहुंच रहे शरणार्थियों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि उनके पहुंचने के पहले भी जो मुस्लिम आबादी इन देशों में है, उनके पहनावे को लेकर, उनकी शादियों के नियम-कानून को लेकर एक सामाजिक तनाव चले ही आ रहा था। एक के बाद एक देश की संसद पहरावे को लेकर मुस्लिम महिला को आजादी देने की कोशिश कर रही है, और कुछ लोग इसे आजादी मान रहे हैं, तो कुछ लोग पहरावे की आजादी को खत्म करना भी मान रहे हैं। ऐसे दोनों नजरियों से परे यह बात साफ है कि संस्कृतियों का टकराव, लोकतंत्र और धार्मिक आस्थाओं का टकराव, स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी, और बाहर से आए हुए लोगों के कामकाज का टकराव, और स्थानीय सरकार के बजट का बाहरी लोगों पर खर्च होने का मुद्दा, इन सबसे दुनिया के बाकी देशों के लोगों को भी सीखने की जरूरत है, क्योंकि जैसे-जैसे दुनिया के देशों में नए टकराव खड़े होंगे, वैसे-वैसे इन मुद्दों पर एक समझदारी दिखाने की जरूरत आती ही रहेगी। जो देश आज लोकतांत्रिक उदारता दिखा रहे हैं, वे आतंकी हमलों को झेलते हुए ऐसी उदारता छोडऩे पर मजबूर भी हो सकते हैं, हो रहे हैं, इसलिए हर संबंधित तबके को उदारता और अमन के महत्व को समझने की जरूरत है।

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