आधी प्लेट में भरता पूरा पेट और बाजार दुगुना बेचता हुआ

संपादकीय
11 अप्रैल 2017


भारत सरकार एक कानून बनाकर देश के रेस्त्रां में खाने की प्लेट को छोटा भी करने की सोच रही है। आज आमतौर पर होटल-रेस्त्रां में दो अलग-अलग आकार की प्लेट में खाना नहीं बेचा जाता, और लोगों को मजबूरी में अधिक खाना बुलवाकर उसे जूठा छोडऩा पड़ता है। कई बार यह भी होता है कि पैसे तो खर्च हो ही चुके हैं इसलिए टेबिल पर आ गए खाने को खत्म करने की इच्छा भी रहती है, और लोग जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। खाना या तो प्लेट में खराब होता है, या पेट में। ये दोनों ही नौबत बहुत खराब है और अमरीका जैसे पूंजीवादी देश की बाजार व्यवस्था का यह असर है कि लोगों को न छोटी बोतल बेची जाए, और न ही खाने के सामान की छोटी पैकिंग या छोटी सर्विंग बेची जाए।
आज भी देश में मध्यम दर्जे के कई ऐसे रेस्त्रां रहते हैं जो कि आधी प्लेट के हिसाब से भी खाने के सामान सर्व करते हैं। इंडियन कॉफी हाऊस जैसे कई जिम्मेदार संस्थान हैं जो कि एक इडली, या एक वड़ा, या कि आधा प्लेट चावल भी देते हैं, और न लोगों का पैसा बर्बाद होता, और न ही उनका पेट बर्बाद होता। देश में इतनी भुखमरी है कि यहां पर खाने की बर्बादी एक जुर्म से कम नहीं है, और ऐसे में भारत अगर एक कानून बनाकर कारोबार को मजबूर करता है कि वे आधे प्लेट में भी सामान बेचें, तो यह एक बेहतर इंतजाम होगा।
अमरीका में हर चीज खूब बड़े आकार की बेची जाती है, और उसका नतीजा यह है कि अमरीकियों का खुद का आकार बहुत बड़ा हो चला है, और भयानक मोटापे के शिकार होकर वे तरह-तरह की बीमारियों से घिर भी रहे हैं। यह अमरीका में एक बहुत फिक्र की बात तो हो गई है, लेकिन वहां का बाजार चीजों को बड़ी-बड़ी पैकिंग में बेचना, बड़ी-बड़ी बोतल और गिलास में सर्व करना बंद नहीं करता है। हिंदुस्तान जैसे देश से जो लोग पहली बार अमरीका जाते हैं, वे रेस्त्रां में जरूरत से दुगुना ऑर्डर कर बैठते हैं, उन्हें यह अंदाज ही नहीं रहता कि एक-एक प्लेट में कितना कुछ आएगा।
दूसरी तरफ भारत सहित दुनिया के कई देश डायबिटीज जैसी बीमारियों को बढ़ते देख रहे हैं, और इसके पीछे खानपान एक बड़ी वजह है। भारत में लोगों को अभी से सावधान करने की जरूरत है वरना पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ बाजार यहां पर खाने में अंधाधुंध मक्खन, घी, नमक, और रसायन परोस रहा है। कोकाकोला किस्म के जो कोल्डड्रिंक भारत के बाजार में हैं, उनकी एक-एक बोतल में इतनी अधिक शक्कर होती है कि उसे अलग से दिखाया जाए तो लोगों की पीने की हिम्मत भी न हो। इसलिए पैकिंग पर यह भी लिखा जाना जरूरी है कि इन सामानों में फैट कितना है, शक्कर कितनी है, और नमक कितना है। अभी भी बहुत छोटे अक्षरों में इसे लिखा जाता है, लेकिन ग्राहक की सेहत के हित में यह होगा कि खानपान की चीजों के सेहतमंद होने के अलग-अलग दर्जे तय किए जाए जैसे कि आज शाकाहारी और मांसाहारी चीजों के हैं। इसके साथ-साथ भारत सरकार को बिना देर किए रेस्त्रांओं पर यह नियम लागू करना चाहिए कि वे हर चीज को आधी प्लेट में भी बेचें।

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