संसद में संस्कृति मंत्री का सीता पर बयान महत्वपूर्ण

संपादकीय
13 अप्रैल 2017


संसद में मोदी सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने भाजपा के ही एक सदस्य के सवाल के जवाब में कहा कि बिहार की सीतामढ़ी में सीता की जन्मस्थली का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने कि सीता की जन्मस्थली आस्था का विषय है जो प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करता। इस मुद्दे पर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सहित बहुत से सांसद चढ़ बैठे और मंत्री से माफी की मांग की।
भाजपा के सदस्य और मोदी सरकार के मंत्री का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि देश के कई हिस्सों में आस्था और प्रमाण का झगड़ा चल रहा है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा लगातार अयोध्या में राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाते आई है, और अयोध्या से दूर, रामकथा की लंका में भी जाने के रास्ते पर रामसेतु का विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। राम जन्मभूमि का मुद्दा हिन्दू और मुस्लिम, दो समुदायों के बीच उस जमीन पर हक की लड़ाई है जो कि हिन्दुओं के मुताबिक राम जन्मभूमि है, और मुस्लिमों के मुताबिक बाबरी मस्जिद। लेकिन रामसेतु का मामला भारत सरकार और हिन्दू संगठनों के बीच की कानूनी लड़ाई है, जिसमें भारत से श्रीलंका के बीच के समंदर के पानी के नीचे डूबे हुए एक ढांचे को हिन्दू संगठन राम की सेना का बनाया हुआ पुल बताते हैं, और भारत सरकार ने उसे एक प्राकृतिक ढांचा बताया था। अब मोदी सरकार के आने के बाद हो सकता है सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रूख कुछ बदला हो।
विपक्ष में रहते हुए भाजपा का रूख राम जन्मभूमि पर जो था, अब सरकार में आने के बाद वह रूख चुप बैठा हुआ है, और सीता जन्मभूमि को लेकर सरकार का जवाब यह साफ करता है कि जब प्रमाण की बात आती है, तो आस्थाओं के कोई प्रमाण नहीं होते हैं। संसद से लेकर अदालत तक केन्द्र सरकार का यह रूख जगह-जगह काम आएगा, इस्तेमाल किया जाएगा, हालांकि मंत्री ने यह साफ किया है कि आस्था प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करती। लोकतंत्र में कई बार यह देखने में आता है कि विपक्ष में रहते हुए किसी पार्टी का जो भी रूख रहता हो, सत्ता में आने के बाद सत्ता की जिम्मेदारियां कुछ फेरबदल जरूर ला देती हैं। अब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही देखें, उन्होंने सरकार सम्हालने के बाद से गैरजिम्मेदारी की वैसी कोई बातें नहीं कही हैं जो कि बरसों से उनकी पहचान बनी हुई थीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखें तो सत्ता में आने के पहले तक वे लगातार दिन में कई बार चुनावी सभाओं में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भारत में बिरयानी खिलाने को लेकर हमला करते थे, और एक-एक हिन्दुस्तानी सैनिक की मौत पर दर्जन भर पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लाने का दावा करते थे। लेकिन सत्ता में उन्हें सियासती हकीकत सिखाई, और वे खुद बिना बुलाए जाकर नवाज शरीफ के घर पर सालगिरह और शादी की मिठाई खाकर आ गए।
हम रूख के ऐसे बदलाव को लेकर ताना कसने के खिलाफ हैं, और हम पुराने बयानों की याद दिलाकर यह उलाहना भी देना नहीं चाहते कि उस वक्त के वायदे के मुताबिक अब हिंसा क्यों नहीं की जाती, अब हमला क्यों नहीं किया जाता। सोच में ऐसा फर्क कोई बुरी बात नहीं है, अगर यह लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते, और इंसाफ के भले के लिए हो। हमारा ख्याल है कि संसद में संस्कृति मंत्री का आस्था और प्रमाण को लेकर दिया गया बयान अदालत में भी उन लोगों के काम आएगा जिन पर आस्था के नाम पर अब तक हमले होते रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि लोकतंत्र में कभी भी आस्था प्रमाणों पर हावी नहीं हो सकती, और आस्था को उन प्रमाणों का विकल्प नहीं माना जा सकता जो कि मौजूद नहीं है। राम जन्मभूमि एक ऐसा ही विवाद है, और इसे भी ऐसी ही सोच के साथ निपटाने की जरूरत है। संस्कृति मंत्री के बयान के दो तरह के मतलब निकाले जा सकते हैं, और हम इसमें से वह मतलब निकाल रहे हैं जो कि लोकतंत्र और न्याय के पक्ष में जाता है।

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