दुनिया के सबसे बड़े वर्दीधारी गुंडे ने गिराया सबसे बड़ा बम

संपादकीय
14 अप्रैल 2017


कल रात अफगानिस्तान-पाकिस्तान सरहद पर अफगानिस्तान की जमीन पर आईएस के अड्डे पर अमरीका ने एक बड़ा बम गिराया जिसे वह दुनिया के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा गैरपरमाणु बम कह रहा है। करीब दस हजार किलो वजन का यह बम अमरीकी फौज ने पहली बार इस्तेमाल किया है, और युद्धोन्मादी, नफरतजीवी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने अपनी फौज को खुली छूट दी है कि वे दुनिया में अलग-अलग जगहों पर तैनात अमरीकी फौज की कार्रवाई खुद तय करें। इस बम ने दुनिया को हैरान इसलिए किया है कि ट्रंप या अमरीका ने पिछले कई महीनों में अफगानिस्तान में आईएस की ऐसी मौजूदगी की कोई बात नहीं कही थी कि उसकी वजह से अफगान गांवों के इस इलाके में ऐसी बड़ी कार्रवाई की जाए। अभी इस बम को चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं, और वहां की जमीनी हालत अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन ट्रंप के रूख से यह समझ पड़ता है कि इतना हमलावर कोई दूसरा अमरीकी राष्ट्रपति आज तक आया नहीं होगा। अभी चार दिन ही हुए हैं जब चीनी राष्ट्रपति से बात करते हुए, केक खाते हुए ट्रंप ने सीरिया पर पांच दर्जन बड़े मिसाइल गिराए थे, और यह दावा था कि सीरिया अपने लोगों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी तरफ सीरिया के राष्ट्रपति असद ने खुलकर कहा है कि ऐसे किसी रासायनिक हथियार के बारे में सीरिया को मालूम भी नहीं है और शायद यह गढ़े हुए सुबूतों के आधार पर किया गया अमरीकी हमला है। लोगों को याद होगा कि अमरीका ने जब इराक पर हमला किया था, तब भी राष्ट्रपति बुश ने यह झूठा दावा किया था कि उसके पास इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के हथियार हैं, और बाद में इराक को तबाह करके भी ऐसा कोई सुबूत न अमरीका को मिला, न दुनिया के सामने आया, और अमरीकी दावा झूठा साबित हुआ।
दूसरी बात यह कि दुनिया से अगर अलकायदा या आईएस जैसे धर्मान्ध और कट्टर आतंकियों को खत्म करना है, तो उसके लिए साथ में बेकसूरों को मारने की एक सीमा होनी चाहिए। सीरिया में जिस जगह मिसाइलें गिराई गईं, वहां पर कितने लोगों की मौत हुई यह अभी सामने भी नहीं आया है, दूसरी तरफ अफगानिस्तान में जहां यह बम गिराया गया है, वहां अमरीकी फौजों की पहुंच थी, और उसके बावजूद इतनी व्यापक तबाही करने वाले बम को गिराने की कौन सी मिलिट्री मजबूरी थी, यह भी साफ नहीं है। लोगों का मानना है कि जब खुद अमरीका कह रहा है कि सात-आठ सौ लोग ही आईएस में रह गए हैं, तब उनमें से कुछ दर्जन लोगों को मारने के लिए इतनी तबाही वाले बम को गिराना एक अंतरराष्ट्रीय गैरजिम्मेदारी की बात है। किसी भी कार्रवाई के अनुपात का भी न्यायोचित होना जरूरी रहता है, और अमरीका हमेशा से पूरी दुनिया पर ऐसे मनचाहे और अनचाहे हमले करते आया है जो कि नाजायज अधिक रहे हैं, गैरजरूरी अधिक रहे हैं, बदनीयत अधिक रहे हैं।
हिन्दुस्तान के एक जासूसी उपन्यास के नाम की तरह आज अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा वर्दीधारी गुंडा हो गया है। फिर ऐसे हमलावर देश में आज ट्रंप नाम का एक ऐसा राष्ट्रपति आ गया है जो कि दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ धकेल रहा है। अफगानिस्तान आज इस हालत में भी नहीं है कि वह अमरीकी फौजी कार्रवाई का कोई विरोध करे, और अभी तो यह भी साफ नहीं है कि वह इसके खिलाफ है या नहीं। दूसरी तरफ कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि अफगानिस्तान के एक कम बसाहट के इस कथित आतंकी-ठिकाने पर अमरीकी बमबारी का एक दूसरा मकसद है कि वह उत्तरी कोरिया के तानाशाह की परमाणु युद्ध की हसरतों को एक चेतावनी देना चाहता है। उसने अपने जंगी जहाज उत्तर कोरिया के आसपास तैनात कर दिए हैं, और जिस तरह उसने अपने जहाज से सीरिया पर मिसाइलें गिराई थीं, अपनी वायुसेना से अफगानिस्तान पर बम गिराया है, हो सकता है कि यह उत्तर कोरिया को एक चेतावनी हो। फिलहाल पाकिस्तान को भी इसे एक चेतावनी मानना चाहिए क्योंकि अफगानिस्तान के बहुत से लोगों ने कहा है कि यह बम तो पाकिस्तान पर गिराना चाहिए था जहां से आईएस आतंकी अफगानिस्तान भेजे जा रहे हैं।

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