किसी भी धर्म को शोर और हल्ले की आजादी क्यों हो?

संपादकीय
18 अप्रैल 2017


फिल्म और टीवी कलाकार सोनू निगम ने एक नए विवाद को शुरू कर दिया है, उन्होंने कहा कि सुबह-सुबह मस्जिद के अजान की आवाज लाउडस्पीकर पर आकर उनकी नींद खराब करती है। यह बात वैसे तो बहुत मासूम है लेकिन आज हिन्दुस्तान की हवा में इतनी सनसनी फैली हुई है कि लोग हर बात के पक्ष और विपक्ष में लाठी लेकर टूट पड़ते हैं। इनकी इस बात पर कई लोगों ने खूब हमला किया, कई तटस्थ लोगों ने याद दिलाया कि रात-रात भर दूसरे धर्मों के भजन और रतजगे का शोर भी झेलना पड़ता है। ऐसे माहौल के बीच में लोगों को ठीक उसी तरह हाथ साफ करने का मौका मिलता है जिस तरह सड़क पर किसी की पिटाई होती रहे तो आते-जाते तमाम राहगीर दो-दो हाथ लगाते चलते हैं।
सोनू निगम ने न तो कोई गलत बात कही क्योंकि सदियों पहले कबीर इसी बात को तब कह गए थे जब लाउडस्पीकर बना भी नहीं था, और उन्होंने कहा था कि मस्जिद की मीनार पर चढ़कर मुल्ला इस तरह बांग देता है कि मानो खुदा बहरा हो गया हो। यह बात कहने का हौसला उन्हीं का था, और आज हिन्दुस्तान में यह बात कहना आसान नहीं है। और तब से लेकर अब तक धीरे-धीरे लाउडस्पीकर बढ़ते चले गए, और मस्जिदों से परे भी मंदिर, गुरुद्वारे, और धार्मिक जलसों पर घर-घर से धार्मिक संगीत निकलकर मीलों तक फैलने लगा। अब जैसे-जैसे आबादी घनी होती चली गई यह शोर परेशान करने लगा और भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी धार्मिक या किसी भी तरह के शोरगुल के खिलाफ बड़े कड़े हुक्म दिए हुए हैं। यह एक अलग बात है कि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट का हाल परिवार के उस बुजुर्ग सयाने की तरह का होकर रह गया है जो कि बोलता बहुत अच्छी बातें है, लेकिन परिवार में उसकी बात सुनता-मानता कोई नहीं है।
हमारा ख्याल है कि किसी एक धर्म की चर्चा किए बिना, पूरे देश से सभी धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर को हटा देना चाहिए, और दूसरी बात यह भी है कि ऐसे लाउडस्पीकर पर सरकार एक नियम बनाकर लाइसेंस भी लागू कर सकती है कि उसका इस्तेमाल करने के पहले अगर इजाजत न ली गई, तो कितना बड़ा जुर्माना हो सकता है, और कितनी कड़ी कैद हो सकती है। फिर यह जुर्माना और कैद न सिर्फ लाउडस्पीकर किराए पर चलाने वाले लोगों के लिए हो, बल्कि उन लोगों के लिए भी हो जो कि धर्मस्थलों के प्रभारी हैं, या जिनके घरों पर इनको लगाया जाता है। यह एक खतरनाक नौबत है कि दूसरों का जीना हराम करते हुए धर्म के नाम पर, या कि किसी और नाम पर इस तरह का कोलाहल किया जाता है कि बीमार तो बीमार, पढऩे वाले बच्चे तक थककर आत्महत्या की कगार पहुंच जाते हैं। भारत में जितना शोर है, उतना शायद ही किसी और देश में देखने मिलता होगा, और धर्म से आगे बढ़कर अब यह शादियों में, निजी कार्यक्रमों में भी इस हद तक देखने मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अपने ही आदेशों को लेकर शर्म से डूब मरें कि उनकी कोई सुनवाई इस देश की सरकारों में नहीं रह गई है।

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