सरकारी अमले को मठाधीश जैसा नहीं जनसेवक बनना होगा

संपादकीय
19 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भयानक गर्मी के बीच हफ्तों चलने वाले अपने सालाना दौरे में अपनी अभूतपूर्व गर्मी दिखाई है। उन्होंने सरगुजा में दो कलेक्टरों को मौके पर ही बदलने की घोषणा की, और एक जिला पंचायत अध्यक्ष को भी हटा दिया। उनके ऐसे तेवर उनके पिछले तेरह-चौदह बरस में कभी नहीं दिखे थे और इससे राज्य के बाकी सरकारी अमले में एक सिहरन दौड़ जानी चाहिए। खुद मुख्यमंत्री के लिए यह मौका अभी नहीं तो कभी नहीं किस्म का है क्योंकि दो बरस बाद के चुनावों में जीत या हार कुछ हद तक कलेक्टरों की काबिलीयत पर भी टिकी रहेगी। कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदे हमेशा ही मुख्यमंत्री की निजी पसंद से भरे जाते हैं और छोटे से राज्य में मुख्यमंत्री की सीधी नजर भी इन ओहदों पर रहती है।
राज्य सरकार के ढांचे में वैसे तो जिलों के प्रभारी सचिव भी बनाए जाते हैं जो कि राज्य के बड़े अफसर होते हैं और कलेक्टरों के साथ संपर्क में रहते हैं। हर जिले का कोई न कोई प्रभारी मंत्री होता है जो कि आमतौर पर दूसरे जिले का होता है। हर कुछ कलेक्टरों के ऊपर एक संभागीय कमिश्नर होता है जिसे खुद भी कलेक्टरी का खासा तजुर्बा होता है। इनके अलावा जिले के पक्ष-विपक्ष के विधायक होते हैं जो कि सरकारी कामों पर नजर रखते हैं। शासन, प्रशासन और राजनीतिक निगरानी की इतनी सतहों के बाद भी अगर किसी जिले में काम खराब होता है तो वह फिक्र की बात है। इसलिए भी कि हर आईएएस अफसर का सपना एक अच्छी कलेक्टरी रहता है, और उसकी स्मृतियां भी कभी अपनी जिला-पोस्टिंग से परे नहीं रह पातीं।
लोकसुराज जैसा जनसंपर्क कार्यक्रम हो या कि मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टरों तक के जनदर्शन कार्यक्रम, इन सबमें भीड़ इस बात की भी सुबूत होती है कि शासन-प्रशासन में अपनी रोजाना की जिम्मेदारी ठीक से पूरी नहीं हो रही। और इस ठीक का ठीक होना आसान नहीं होता। इसके लिए मंत्रियों और अफसरों का जनसेवा के लिए समर्पित होना भी जरूरी होता है। और यह समर्पण सरकारी नियमों से या मंत्री पद की शपथ से नहीं आ जाता? इसके लिए लोकतंत्र और जनकल्याण की एक गहरी आस्था भी जरूरी होती है जिसकी बहुत कमी आज के अधिकतर नेताओं और अफसरों में दिखती है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों पर कोई तोहमत लगाना बेकार है।
छत्तीसगढ़ में सरकार को लीक से हटकर एक मौखिक पहल करने की जरूरत है। जिला कलेक्टरों का यह नाम तब तो ठीक था जब वे अंग्रेजी राज में टैक्स कलेक्ट करते थे, आज तो वे जितना कलेक्ट करते हैं, उससे अधिक खर्च करते हैं इसलिए यह नाम जाना चाहिए। कलेक्टरों को जिलाधीश भी कहा जाता है जो कि मठाधीश जैसा लगने वाला नाम है और यह नाम भी जाना चाहिए। अधिकारी शब्द की जगह सेवक शब्द आना चाहिए, जैसे कि जिला जनसेवक। जब तक कलेक्टरों का नाम जिला जनसेवक नहीं होगा तब तक सेवा की सोच नहीं आ पाएगी। इसके अलावा सरकार को मंत्रियों और अफसरों की गाडिय़ों से लाल-नीली बत्तियां भी हटानी चाहिए, सायरन और बत्तियां बददिमागी बढ़ाते हैं और मंत्री-अफसर जनता से कट जाते हैं। सरकार को फाइलों पर लगने वाले पदनाम लाल फीतों को भी बदलना चाहिए। लाल रंग ट्रैफिक को रोकने वाला होता है और लाल फीताशाही की सोच ऐसी ही रहती है। इसे बदलकर हरा रंग करना चाहिए ताकि फाइलें आगे बढ़ सकें। अफसरों और मंत्रियों का बुरा बर्ताव भी सख्ती से बंद करवाना चाहिए और आए दिन मीडिया में आने वाली खबरों पर पार्टी संगठन को भी ध्यान देना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक हैरतअंगेज ताकत के साथ काम करते हैं। उनकी मेहनत में कुछ और मौलिक सुधारों से अधिक असर आ सकता है। देश में जगह-जगह अलग-अलग मुख्यमंत्री सादगी और सुधार की बातें करते रहे हैं। आने वाला वक्त जनता की कड़ी कसौटी का है, छत्तीसगढ़ के सरकारी अमले को भी मठाधीश के बजाय जनसेवक बनना चाहिए। 

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