जनता की नफरत की एक वजह, लालबत्ती खत्म...

संपादकीय
20 अप्रैल 2017


कल सुबह इसी वक्त जब हमने इसी जगह लिखा था कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लाल बत्तियां बंद करवा देनी चाहिए क्योंकि वे सत्ता को जनता से दूर कर रही हैं, तब ऐसी कोई चर्चा भी नहीं थी कि दोपहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में लाल बत्तियां खत्म करने जा रहे हैं। इस पहली मई, मजदूर दिवस से अंग्रेजी सामंतवाद का यह एक बोझ खत्म होने जा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से लगातार इस बात की वकालत कर रहे थे और हाल में कुछ मुख्यमंत्रियों ने ऐसा किया भी था। प्रधानमंत्री की इस पहल को सरकार में एक सादगी, किफायत और जनसेवा के रूप में देखते हुए देश की बाकी सरकारों को भी अपने-अपने स्तर पर तय करना चाहिए कि कौन सी बातें उन्हें जनता से दूर ले जाती हैं और उन बातों को खत्म करना चाहिए। कुछ दिन पहले जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचीं तो उन्हें लेने नरेन्द्र मोदी बिना सुरक्षा, बिना लालबत्ती, सादी गाड़ी में, बिना टै्रफिक रोके एयरपोर्ट गए थे, वह बात शायद इस फैसले का एक ट्रायल थी।
प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने राष्ट्रपति के संबोधन में महामहिम लिखना बंद करवाया, बाद में राज्यों के राज्यपालों को भी यह बात माननी पड़ी। राष्ट्रपति भवन से लेकर छत्तीसगढ़ के इक्कीसवीं सदी में बने राजभवन तक में कार्यक्रमों के लिए दरबार हॉल हैं। ऐसे सामंती नाम भी खत्म होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में दरबार शब्द महज व्यंग्य और गाली की तरह इस्तेमाल हो सकता है, किसी सम्मान के लिए नहीं। कुछ हफ्ते पहले हमने भारत की गर्मी और जनता के पैसों पर एयरकंडीशनिंग की चर्चा करते हुए लिखा था कि अंग्रेजों की छोड़ी गंदगी को भारतीय अदालतों में काले कोट और काले लबादों की शक्ल में ढोना बंद करना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी भारतीय आत्मगौरव दिखाते हुए अंग्रेजी पोशाक की ऐसी बंदिश फेंक देनी चाहिए जिसकी वजह से वकील और जज इंग्लैंड के मौसम में जीते हैं।
सत्ता के लोगों को सायरन, पायलट गाड़ी, और गाडिय़ों के काफिले भी खत्म करना चाहिए। जगह-जगह सत्ता के लिए जनता को चौराहों पर रोका जाता है और इससे सड़क पर कोई मरीजों की मौत भी हुई है, घायल भी अस्पताल नहीं पहुंच पाए। सत्ता को पता नहीं जनता की उस नफरत का अहसास होता है या नहीं जो फंसी हुई जनता के मन से निकलती है। छत्तीसगढ़ की जनता को याद है कि राजधानी के सांसद ने अपने ही शहर में बिना लालबत्ती या सायरन निकलने से मना कर दिया और सरकार पर दबाव डालने का सार्वजनिक बयान भी दिया था। अपने ही शहर में लोग सायकल से किस तरह सायरन तक पहुंचते हैं इसकी और भी बहुत सी मिसालें हैं। छत्तीसगढ़ का अकेला एयरपोर्ट राजधानी रायपुर में होने से बिलासपुर हाईकोर्ट के जज भी लालबत्ती, सायरन, और पायलट गाड़ी के साथ आते-जाते दिखते रहते हैं मानो एयरपोर्ट पहुंचते ही उन्हें फैसला सुनाने की हड़बड़ी हो। जब देश की बड़ी अदालतें ही अपने ऐसे अलोकतांत्रिक ताम-झाम का मोह नहीं छोड़ पातीं, तो उनके पास जाकर कौन गुहार लगा सकते हैं कि सरकार में सादगी लाई जाए।
सरकारों को मंत्रियों और अफसरों के घर-दफ्तरों के खर्च में भी कटौती करनी चाहिए। इसके लिए हर राज्य को एक किफायत कमेटी बनानी चाहिए जो निजी कामों के लिए कर्मचारियों, गाडिय़ों, बिजली, और बाकी खर्च की सीमा तय करे। सत्ता को जनता के रूख को पहचानना चाहिए, जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में पांचों राज्यों में मौजूदा सरकारों को पलट दिया, इससे जनता की नाराजगी साफ दिखती है और कोई पार्टी या नेता इससे नहीं बच पाए। दीवारों पर लिखी इस बड़ी-बड़ी लिखावट को अनदेखा करना ठीक नहीं।
भारत की हिंदुस्तानी जुबान में लालबत्ती शब्द अच्छा नहीं रहा। लालबत्ती इलाका या रेड लाईट एरिया सबसे बुरे माने जाने वाले धंधों का रहा। इससे छुटकारा ही ठीक है। यह एक और बात है कि प्रधानमंत्री के हाथ पूरे देश के लिए नियम बदलना है, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले दिन से ही लालबत्ती हटा दी थी। देर से ही सही, भारतीय सत्ता को बदनाम रेड लाईट छोडऩी चाहिए।

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