बेकाबू रफ्तार से अनिवार्य किए जा रहे आधार कार्ड के खतरे

संपादकीय
23 अप्रैल 2017


सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर केन्द्र सरकार से नाराजगी जाहिर की है कि उसकी मनाही के बावजूद सरकार तरह-तरह के कामों के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल अनिवार्य कैसे करती चल रही है? अदालत ने पूछा है कि जब यह कह दिया गया था कि किसी भी बात के लिए आधार को अनिवार्य न किया जाए, तब बैंक खातों से लेकर सिमकार्ड तक, और रेल रिजर्वेशन से लेकर कई दूसरे जरूरी कामों तक आधार कार्ड को जरूरी कैसे बनाया जा रहा है? दूसरी तरफ आज ही एक खबर है कि झारखंड में सरकार की एक वेबसाइट की एक गलती से दस लाख से ज्यादा लोगों के आधार कार्ड नंबर उनकी पहचान के साथ लीक हो गए हैं, और अब उनकी जानकारी उनके लिए कई तरह के खतरे खड़ी कर सकती है। लोगों को याद होगा कि हर कुछ दिनों में देश में कहीं न कहीं से यह खबर आती है कि बैंक खातों का नंबर, या कि आधार कार्ड का नंबर लेकर किस तरह से ठगी और जालसाजी चल रही है, और सरकार के पास इसके रोकथाम का कोई औजार दिखता नहीं है।
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि भारत जिस रफ्तार से घर-घर तक, और हर नागरिक तक की पहचान डिजिटल तरीके से करते चल रहा है, और हर छोटे-बड़े काम के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया जा रहा है, यह तैयारी चल रही है कि किस तरह लोग आधार कार्ड नंबर और अपने अंगूठे के निशान के साथ भुगतान कर सकेंगे। ऐसे में एक दूसरी खबर यह भी है कि छत्तीसगढ़ की राशन दुकानों में बड़ी संख्या में लोगों को आधार कार्ड को लेकर एक परेशानी झेलनी पड़ रही है। उनके राशन कार्ड में सदस्यों की संख्या अलग है, और आधार कार्ड में अलग है, तो उन्हें राशन कम लोगों के लिए ही मिल रहा है। हो सकता है कि लोगों की अपनी दी गई जानकारी भी गलत हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि सरकार की दर्ज की गई जानकारी में गलती हो, और अब अचानक सात लोगों के परिवार को चार लोगों का राशन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड की अनिवार्य के खिलाफ दायर की गई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इसे अनिवार्य बनाने पर रोक लगा दी है। लेकिन देश में सरकारें और प्रशासन अपनी मर्जी से जगह-जगह अदालती आदेश के खिलाफ जाकर आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी उन लोगों को भी गैस एजेंसियों से रसोई गैस बिना आधार कार्ड नहीं मिल रही जो कि सरकारी रियायत को छोड़ चुके हैं, और खुले बाजार से बिना किसी रियायत वाली रसोई गैस ले रहे हैं।
भारत में सरकारें न तो साइबर और डिजिटल सुरक्षा के लिए तैयार हैं, और न ही दुनिया की कोई भी ताकत हैकरों और साइबर-मुजरिमों के मुकाबले में पूरी तरह से सुरक्षा जुटा पाती हैं। ऐसे में भारत के हर नागरिक की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को तो आधार कार्ड दर्ज करते चल रहा है, हर सफर, हर खरीदी, हर बैंक भुगतान, हर सरकारी काम आधार कार्ड के रास्ते अपने डिजिटल पदचिन्ह छोड़ते चल रहे हैं। ऐसे में लोगों की निजी जिंदगी, और उनकी हर तरह की गोपनीयता बुरी तरह खतरे में है। सरकार ने अब तमाम सरकारी अनुदान, या कि मजदूरी, इन सबको अनिवार्य रूप से बैंक से भी जोड़ दिया है, और आधार कार्ड से भी। यह सिलसिला खतरनाक है, और यह देश एक बुलबुले पर बैठा हुआ है जिसे कि कोई भी साइबर-आतंकी ताकत पल भर में फोड़ सकती है, और उस हालत में देश की सारी व्यवस्था पल भर में चौपट हो सकती है। आज हर काम के लिए आधार कार्ड जरूरी किया जा रहा है, और कल आधार कार्ड का ढांचा ही अगर साइबर-हमले में तबाह कर दिया जाएगा, तो देश की जिंदगी मानो थम जाएगी।
एक नारे की तरह डिजिटल-विकास अच्छा तो लगता है, लेकिन कम्प्यूटरों पर जो लोग ऐसी योजनाओं को, और ऐसी व्यवस्था को बहुत आकर्षक दिखाते हैं, उन्हीं में से एक की गलती से एक प्रोग्राम ऐसा बन गया कि दस लाख से अधिक लोगों के नाम-पते, आधार नंबर, और बैंक खाते सब उजागर हो गए हैं। सरकारों को एक राजनीतिक फायदे के लिए नारेनुमा कोई भी योजना ऐसी, और ऐसे रफ्तार से लागू नहीं करनी चाहिए जो कि उनके काबू के बाहर हो।

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