मीडिया की सुर्खियों में शब्द घटाने कोई अभियुक्त नहीं, सीधे मुजरिम

आजकल
10 अप्रैल 2017
अभी कुछ दिन पहले देश के एक सबसे बड़े अखबार ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पिछले बरस से लापता चल रहे छात्र, नजीब, के बारे में पहले पन्ने पर एक बड़ी सी खबर छापी कि दिल्ली पुलिस ने अपनी जांच में यह पाया है कि नजीब इंटरनेट पर आईएसआईएस में शामिल होने के तरीके ढूंढ रहा था। अब यह बात पुलिस की जांच के बारे में थी इसलिए इसमें किसी अटकलबाजी की गुंजाइश नहीं थी। अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने औपचारिक रूप से कैमरों के सामने इस बात का खंडन किया और कहा कि दिल्ली पुलिस को ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है।
लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि दिल्ली पुलिस उस केन्द्र सरकार के तहत काम करती है जो जेएनयू से एक गहरा और चौड़ा वैचारिक मतभेद रखती है और जेएनयू के बागी तेवरों के छात्रों के लिए, उनकी साख बचाने के लिए, दिल्ली पुलिस पर कोई दबाव नहीं हो सकता था। लेकिन इस बड़े अखबार की इस खबर के चलते जेएनयू के छात्रों के आईएसआईएस से रिश्ते जोडऩे की एक बड़ी कोशिश, और पूरी तरह बेबुनियाद कोशिश हुई थी। इस कोशिश से देश के अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की साख पर भी एक आंच लाई जा रही थी जिसके कुछ लोगों के बारे में देश के कुछ दूसरे तबकों की राय रहती है कि वे गद्दार हैं। लेकिन स्वघोषित राष्ट्रवादियों के ऐसे नारों से परे जब एक बड़ा अखबार ऐसी खबर प्रमुखता के साथ छापता है, तो यह अखबारनवीसी से परे की एक बात हो जाती है। और दिल्ली शहर में सबसे बड़े अखबार को यह सहूलियत तो हमेशा ही रहती है कि वे पुलिस से अपनी ऐसी सनसनीखेज जानकारी पर बात कर ले।
लेकिन अखबारनवीसी और अब उसके और बुरे मीडिया-संस्करण, टीवी चैनलों को देखें तो लगातार यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, और किसी की साख को चौपट करने में पल भर भी नहीं लगता। छत्तीसगढ़ में ही हम रोजाना देखते हैं कि नक्सल आरोपों पर किसी को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें मीडिया नक्सली लिख देता है। ऐसे लोग निहत्थे रहते हैं, गरीब और आदिवासी रहते हैं, शहरों से दूर जंगलों में बसे रहते हैं, और उनके पास अपनी साख को बचाने के लिए किसी वकील की कोई सहूलियत नहीं होती। ऐसे लोगों को नक्सल-आरोपी या नक्सल संदेह से घिरे लिखने जितनी जहमत भी नहीं उठाई जाती। और यही हाल बलात्कार या हत्या के आरोप से घिरे हुए लोगों का होता है, और किसी अखबार या चैनल की सुर्खी में इस बात की जगह निकालना अब बंद हो गया है कि ये लोग आरोपी हैं, या अभियुक्त हैं, या कटघरे में खड़े हैं।
अभी कश्मीर या किसी और जगह के एक मुस्लिम नौजवान ने आतंक के आरोपों से तेरह बरस बाद बरी होने पर दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार में उसकी गिरफ्तारी के वक्त की खबरों की कतरनें जारी करते हुए पूछा कि तेरह बरस पहले इस अखबार ने उसे आतंकी करार दे दिया था, और बड़े-बड़े हर्फों में उसे एक बड़ी आतंकी घटना के लिए जिम्मेदारी आतंकी लिखा था। अब वह पूरी तरह से बरी हो चुका है, लेकिन ऐसी खबर की वजह से उसका और उसके परिवार का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
दरअसल भारत का मीडिया किसी की पगड़ी उछालने के पहले महज यह देखता है कि उसकी ताकत कितने बड़े वकील को रखने की है। एक बार यह समझ आ जाए कि जिसके खिलाफ लिखा जा रहा है, वह मामूली वकील भी नहीं कर सकता, तो मीडिया न केवल उसके खिलाफ मनमर्जी झूठ छापते और दिखाते चलता है, बल्कि वह अदालत और जज बनकर उसे कुसूरवार भी ठहरा देता है। ऐसी मीडिया-ट्रायल के खिलाफ भी पिछले कुछ समय से लगातार बात उठ रही है कि मीडिया का दायरा कहां खत्म होता है, और जिस तरह अदालतों को नसीहत दी जाती है कि वे अपने दायरे से बाहर जाकर काम न करें, क्या अदालतों का दायरा भी तय करने की जरूरत है?
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ अरसा पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से यह जानना चाहा है कि किसी मामले की छानबीन के चलते हुए उसकी कितनी जानकारी मीडिया को दी जानी चाहिए, और कौन सी जानकारियां ऐसी हैं जो जांच अफसर भी उजागर न करें, मीडिया को न बताएं, जांच में घिरे लोगों की इज्जत चौपट न करें।
लेकिन जैसा कि आसपास के माहौल का असर हर किसी पर होता है, भारत के अखबारों पर पहले तो असर टीवी चैनलों का पड़ा जो कि ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में एक-दूसरे से कुछ मिनटों भी आगे रहने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं, और इस चक्कर में वे खबरों को चटपटा और सनसनीखेज बनाकर, आपाधापी में, जल्द से जल्द पेश करने के मुकाबले में रहते हैं। अखबारों ने भी धीरे-धीरे टीवी के इसी अंदाज को अपनाना शुरू कर दिया, और अब अखबार अपने वेबसाइटें भी रखते हैं, और उन पर तो और भी गैरजिम्मेदारी के साथ खबरें डाली जाती हैं।
इसके बाद आया सोशल मीडिया जो कि किसी भी तरह की जिम्मेदारी और जवाबदेही के बिना एक आजाद पंछी सरीखा है और जो जहां चाहे वहां से दाना चुग सकता है, जहां चाहे बैठ सकता है, और जहां चाहे बीट कर सकता है। ऐसे सोशल मीडिया का असर भी टीवी पर पड़ा और अखबारों पर भी पड़ा। नतीजा यह हुआ कि अब अखबार अपनी चूक को जायज और मासूम ठहराने के लिए सोशल मीडिया पर तोहमत जडऩे लगे हैं कि यह खबर तो सोशल मीडिया पर चारों तरफ थी, वॉट्सऐप पर चारों तरफ थी, और इसलिए इसे छाप दिया था। मामला इतना बिगड़ गया है कि एक टीवी चैनल ने तो वायरल सच या वायरल झूठ नाम से एक कार्यक्रम ही रोज सुबह दिखाना शुरू कर दिया है कि सोशल मीडिया पर या संदेशों पर जो बातें तैर रही हैं, उनमें सच क्या हैं, और झूठ क्या हैं?
सोशल मीडिया तो एक बेकाबू औजार है, और यही हाल मोबाइल फोन पर फैलने वाले संदेशों का है जो कि सोशल मीडिया न होते हुए भी थोक में सैकड़ों लोगों को भेजे जाने वाले संदेश रहते हैं, वीडियो रहते हैं, और तस्वीरें रहती हैं। लेकिन परंपरागत मीडिया को इस बारे में फिर से सोचना चाहिए कि क्या किसी संदेही को, किसी आरोपी को, किसी अभियुक्त को मुजरिम करार देने वाली भाषा लिखना जारी रखा जाए, या फिर उन लोगों का भी ख्याल रखा जाए जो कि महंगे वकील खड़े करके मीडिया पर मानहानि के मुकदमे नहीं कर सकते। भारत में न्यायपालिका सौ में से शायद 95 लोगों को बरी कर देती है, और गिने-चुने लोगों को ही सजा मिलती है। ऐसे में किसी का हक नहीं बनता कि वे अभियुक्तों को हत्यारा, बलात्कारी, नक्सली, आतंकी करार देते चलें।

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