अक्षय तृतीया के मौके पर एक चर्चा बालविवाह से महिला आरक्षण तक

संपादकीय
27 अप्रैल 2017


अक्षय तृतीया का मौका भारत के कई हिस्सों में बालविवाह लेकर आता है। इसके खिलाफ कानून बने एक जमाना हो गया, लेकिन गांव-जंगल और शहरों में भी होने वाले बालविवाह को रोक पाना सरकार के लिए एक मुश्किल काम होता है। एक तरफ तो मुस्लिम समाज में शरीयत का हवाला देकर कमउम्र बच्चियों की शादी को कानूनी ठहराने और करने की जिद कई जगहों पर देखने को मिलती है, लेकिन दूसरी तरफ हिन्दू समाज में, या आदिवासियों में भी बालविवाह जारी हैं। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें जागरूक हो चुकी बच्चियों ने खुद पुलिस या अफसरों के पास जाकर अपनी होने जा रही शादी को रूकवाया है।
लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि कमउम्र के बच्चों की जब शादी कर दी जाती है, और कमउम्र की लड़की मां बन जाती है, तो उस लड़की की सेहत तो तबाह होती ही है, ऐसे बच्चे की सेहत भी खराब से शुरू होती है, और जिंदगी की आखिर तक कई हिसाब से कमजोर बनी रहती है। यह बात चिकित्सा वैज्ञानिकों ने निर्विवाद रूप से साबित की है कि कमउम्र में मां बनने वाली लड़की एक कमजोर बच्चे को जन्म देती है, और खुद की सेहत भी खतरे में डालती है। लेकिन भारत के बहुत से समाजों में लड़की की जुबान नहीं होती है, और मां-बाप जब और जहां, जैसे चाहें उसे एक खूंटे से बांध देने की तरह किसी लड़के से बांध देते हैं। इस बारे में न सिर्फ सरकार की कोशिश की जरूरत है, बल्कि समाज के भीतर लोगों को बालविवाह रोकने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। आज एक बड़ी चुनौती यह है कि जिन इलाकों या जिन समाजों में बालविवाह का प्रचलन है, वहां पर पड़ोसी या रिश्तेदार, या कि जात-बिरादरी के लोग चूंकि शादी के जलसे में शामिल होते हैं, इसलिए उनकी दिलचस्पी ऐसे जलसों को रोकने की नहीं होती। पुलिस में भी बहुत से मामलों में ऐसे समाज से आए हुए लोग रहते हैं, और वे भी ऐसी शादियों को अनदेखा करना बेहतर समझते हैं।
सरकार को स्कूल, मितानिन, और अलग-अलग इलाकों में काम करने वाले जनसंगठनों का हौसला बढ़ाकर निगरानी का काम करना चाहिए। ऐसे बालविवाह बड़ी संख्या में अक्षय तृतीया के दिन देखे महूरत पर होते हैं, और इसके कुछ दिन पहले से अगर नजर रखी जाए, और कुछ जिद्दी मां-बाप पर कानूनी कार्रवाई की जाए, तो कुछ बरसों में जाकर हालत सुधर भी सकती है। भारत में लड़कियों ने स्कूली पढ़ाई से लेकर कॉलेजों तक में अपनी काबिलीयत साबित की है, और अपने कुनबे का नाम रौशन भी किया है। ओलंपिक से लेकर बाकी मुकाबलों तक भारत की लड़कियां लड़कों से भी आगे साबित हुई हैं। पिछले दिनों आई कुछ फिल्मों में लड़कियों के गौरव का बखान भी समाज सुधार के काम आना चाहिए, और मां-बाप को यह लगना चाहिए कि लड़की बोझ नहीं है, और वह भी परिवार की ताकत है। यह जागरूकता रातों-रात नहीं आ सकती, और सिर्फ कानून से भी नहीं आ सकती।
आज भारत की भाषाओं और बोलियों में, जिन कहावतों और मुहावरों में लड़की और महिला के लिए अपमान की बात रहती है, उन सबका विरोध करने की जरूरत है। खुद महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि किसी अफसर के या नेता के नालायक होने पर उसे चूडिय़ां भेंट करना खुद महिलाओं का अपमान है, और यह हरकत ऐसा बताती है कि मानो चूडिय़ां कमजोरी का प्रतीक हैं, नालायकी का प्रतीक हैं। भारत की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में लड़कियों और महिलाओं को बराबरी सम्मान और हक दिलाने के लिए सड़क से संसद तक लंबा संघर्ष लगेगा, और इसके बिना कन्या भ्रूण हत्या, बालविवाह, कन्याशिक्षा, दहेज हत्या, ऐसे मोर्चों पर समाज में सकारात्मक सोच विकसित नहीं की जा सकेगी। इस बारे में एक कदम संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का भी उठाने की जरूरत है। इससे सीधे-सीधे आम महिला को फायदा नहीं होगा, लेकिन समाज में महिलाओं के जायज हक की बात मजबूती से स्थापित होगी। लड़कियों और महिलाओं से जुड़े हुए बहुत सारे मामले ऐसे हैं जिन पर साथ-साथ काम करने की जरूरत है, बालविवाह से लेकर महिला आरक्षण तक।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें