बस्तर की आज की नौबत, सबसे काबिल को जिम्मा देना होगा...

संपादकीय
28 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में अभी ताजा नक्सल हमले को लेकर आज विधानसभा के एक दिन के सत्र में बहस चल रही है कि राज्य की नक्सल नीति सही है या गलत? यह एक दिन का सत्र वैसे तो जीएसटी विधेयक को राज्य विधानसभा की मंजूरी देने के लिए बुलाया गया है, लेकिन सुकमा का ताजा नक्सल हमला इतना बड़ा मुद्दा है कि उस पर चर्चा बिना पक्ष-विपक्ष एक साथ बैठ नहीं सकते थे। इस बीच कल से दिल्ली से भोपाल होते हुए रायपुर तक यह चर्चा चल रही है कि छत्तीसगढ़ में इस ताजा हमले के बाद अब राज्य के पुलिस-मुखिया को बदलना तय हो चुका है, और इस सिलसिले में एक अफसर का नाम भी हवा में तैर रहा है।
दरअसल बस्तर के हालात हर वक्त ऐसी नौबत लाते हैं कि राज्य सरकार नाकामयाबी की जिम्मेदारी किसी कंधे पर डालते हुए उसे किसी कुर्सी से हटा सके। इसमें पुलिस के अफसर भी हो सकते हैं, प्रशासन के अफसर भी हो सकते हैं, और किसी पद पर बैठे हुए राजनेता भी हो सकते हैं। लेकिन छोटे राज्य की कई दिक्कतों में से एक दिक्कत यह भी रहती है कि गिने-चुने ओहदों और गिने-चुने अफसरों के बीच पसंद-नापसंद की संभावना सीमित रहती है। छत्तीसगढ़ बहुत सी सरकारी कुर्सियों को लेकर यह दुविधा झेल रहा है, और हम यह भी नहीं मानते कि किसी एक वारदात के बाद किसी अफसर को बदलना जरूरी रहता है। यह भी देखने की जरूरत रहती है कि वारदात के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार दिखने वाले अफसरों के पीछे की व्यापक जिम्मेदारी क्या दूसरे अफसरों पर तो नहीं है? और बाकी तमाम बातों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की सरकार पर आज एक यह दबाव भी बना हुआ है कि आने वाले चुनाव को ध्यान में रखते हुए किस-किस बड़े ओहदे पर चेहरे बदले जाएं? और सरकार के सामने एक यह राजनीतिक दुविधा भी रहती है कि हालात सम्हालने के लिए किसी कड़क अफसर को जिम्मा दिया जाए, या फिर किसी नर्म अफसर को तैनात किया जाए ताकि चुनाव के समय सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कुछ नर्मी भी हासिल रहे।
हमारा यह मानना है कि बस्तर का मोर्चा अपने आपमें महज बंदूकों की तैनाती से नहीं जीता जा सकता। इसके लिए प्रशासन के राजधानी से लेकर ब्लॉक स्तर तक के लोगों को संवेदनशील अगर नहीं बनाया जाएगा, तो पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की जान तो फालतू में जाती रहेगी। सरकार को किसी हमले के बाद प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, एक दीर्घकालीन योजना और सोच के तहत पूरे के पूरे प्रशासन को अधिक संवेदनशील, और कम भ्रष्ट बनाना होगा। आज खासकर बस्तर में यह बात बिल्कुल ही उल्टी है, अफसर और नेता वहां पर अधिक भ्रष्ट हैं, और कम संवेदनशील हैं। ऐसे में नक्सलियों को जमीन से उखाडऩा करीब-करीब नामुमकिन लगता है। अब तो यह भी लगने लगा है कि नक्सली आतंक के तले गांव के लोग उनके साथ रहते आए थे, लेकिन अब वे कुछ हद तक उनसे हमदर्दी भी रखने लगे हैं, क्योंकि वहां पर पुलिस और बाकी सरकारी अमला अपने को जनता का हमदर्द साबित नहीं कर पाए हैं।
हम विधानसभा या विधानसभा के बाहर सत्तापक्ष या विपक्ष के बीच नक्सल मोर्चे की सोच में किसी जरूरत का फर्क नहीं देखते, लेकिन हम यह जरूर देखते हैं कि काम करने के तौर-तरीकों में एक बुनियादी फेरबदल की जरूरत है। जब राज्य सरकार के फैसले बड़े अफसरों की तैनाती में बड़ी कड़ी पसंद या नापसंद से होने लगते हैं, तो जाहिर है कि कम काबिल लोग भी अधिक बड़ी जिम्मेदारी पा जाते हैं। सरकार को यह सोचना होगा कि उसकी पसंद कोई खास अफसर हैं, या कि व्यापक जनहित है? आने वाले हफ्तों में सरकार को ऐसे कई कड़वे फैसले करने पड़ सकते हैं, और अगर ये फैसले गलत हुए, मौजूदा सरकार के इस कार्यकाल में नौबत जरा भी नहीं सुधर पाएगी। सरकार को बड़े कड़े दिल के साथ सबसे काबिल लोगों को जिम्मा देना होगा।

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