भाजपा से बाकी पार्टियों को समझने-सीखने की जरूरत

संपादकीय
29 अप्रैल 2017


दिल्ली की लगातार मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित ने कल यह कहा कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष होने जा रहे, और आज के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को हर दिन दो-तीन घंटे पार्टी ऑफिस में देने चाहिए। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी ऐसा करती थीं, और इसी वजह से वे पार्टी के लोगों से मिल पाती थीं। अब यह सलाह यह भी बताती है कि राहुल गांधी कुछ घंटे भी पार्टी ऑफिस में नहीं बैठते। इस पार्टी का जो सफाया उत्तरप्रदेश में हुआ है, उसके बाद भी अगर पार्टी के भीतर से ऐसी सलाह उठने की नौबत बनी हुई है, तो इस पार्टी का भविष्य अंधकार के सिवाय और क्या होते दिखता है? कांग्रेस पार्टी से ही जिसकी राजनीति चलनी हो और जिसका भविष्य तय होना हो, उसे अगर पार्टी ऑफिस की ही फुर्सत नहीं है, तो फिर पार्टी को कोई दूसरा अध्यक्ष ढूंढना चाहिए, बजाय कुनबे के भीतर के वंशवादी राजतिलक के।
हम इस मुद्दे पर आज नहीं लिखते अगर अभी सामने यह खबर नहीं होती कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 2019 की चुनावी तैयारी के लिए 95 दिनों का भारत भ्रमण कर रहे हैं, और इसी के तहत वे आज जम्मू पहुंचे हैं। किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का ऐसा संगठित दौरा और बैठकों का सिलसिला उस पार्टी के चौकन्ने होने का एक सुबूत होता है। अगले पखवाड़े अमित शाह तीन दिन छत्तीसगढ़ में भी रहने वाले हैं, और जाहिर है कि अपनी पार्टी, और अपनी पार्टी की सरकार, इन दोनों को उन्हें अधिक करीब से देखने का मौका भी मिलेगा, और कार्यकर्ताओं से बेहतर बातचीत भी हो सकेगी। इससे संगठन के लोगों और सरकार पर निश्चित रूप से एक दबाव बनेगा क्योंकि आज पूरे देश में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा को एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचाया है। आज पार्टी एक किस्म से इन्हीं दोनों के कब्जे में दिखती है, और तमाम राज्यों के संगठन भी यह मानकर चल रहे हैं कि मोदी के नाम पर भाजपा चुनाव ठीक उसी तरह जीत रही है जिस तरह कि एक वक्त इंदिरा के नाम पर कांग्रेस जीत जाती थी।
मोदी और अमित शाह से असहमति रखने वाले राजनीतिक दलों को भी उनके कामकाज के तरीके, और उनकी मेहनत से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। आज देश में चारों तरफ मोदी पर यह तोहमत लगाने वाले लोग कम नहीं हैं कि वे अम्बानी और अडानी के हाथों में खेलते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि उन पर, या उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लग पाया है, और देश में यह जनधारणा है कि मोदी राज में भ्रष्टाचार घटा है। इसके अलावा जिस राज्य में चुनाव हुए, वहां पर भाजपा ने बड़ी मेहनत से पहले से तैयारी की, और चुनाव को रणनीति के साथ लड़ा, और बहुत सी जगहों पर जीता भी। धीरे-धीरे करके भाजपा अपने दम पर, और अपने सहयोगी दलों के साथ एक-एक करके देश के इतने बड़े हिस्से पर काबिज हो चुकी है कि जैसा कभी जनसंघ या भाजपा ने सपना भी नहीं देखा था। इसलिए लोकतंत्र के भीतर जिन कानूनी तौर-तरीकों से चुनावी मुकाबला किया जा सकता है, उसकी तैयारी राजनीतिक दलों को आज की भाजपा से सीखने की जरूरत है। आज भारतीय जनता पार्टी कई जगह अपनी सरकारों के रास्ते भ्रष्टाचार में उलझी होगी, लेकिन देश में वामपंथी दलों के अलावा और कौन सी पार्टी है जो कि ऐसे भ्रष्टाचार में उलझी हुई न हो? ऐसी कौन सी पार्टी है जिसने दलबदलुओं को टिकट न दी हो? भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में आखिर में जाकर बस यही मायने रखती है कि कौन सी पार्टी बिना किसी जुर्म में फंसे अपने या पराये लोगों के मार्फत सदन में बहुमत बना सकती है। भारतीय जनता पार्टी ने आज मोदी-शाह की अगुवाई में पार्टी चलाने, और चुनाव लडऩे के कुछ नए तरीके सामने रखे हैं, उन्हें अपनाना हो, या कि न अपनाना हो, दूसरी पार्टियों को उनका अध्ययन जरूर करना चाहिए। हमें याद नहीं पड़ता कि किसी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष सौ दिनों के राष्ट्रीय दौरे पर इसके पहले इस तरह कभी निकला हो। 

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