तीन तलाक खत्म करने का वक्त

संपादकीय
3 अप्रैल 2017


तीन बार कहकर तलाक दे देने की मुस्लिम समाज की प्रथा के खिलाफ मोदी सरकार एक सहमति और जनमत तैयार करने की कोशिश कर रही है, और जो लोग भाजपा या संघ परिवार से परे के हैं, और जो लोग मुस्लिमों के बचाव की कोशिश करते रहे हैं, वे आज दुविधा में हैं कि क्या करें? अगर तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की बात करें, तो मुस्लिम समाज के मर्द और मुल्ला नाराज हो सकते हैं, और यह बात उन लोगों को ठीक नहीं लगती जिन लोगों ने राजीव गांधी के वक्त संविधान संशोधन करके शाहबानो की हत्या की थी। शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट ने उसका हक दिलाया था, और मुस्लिम समाज की नाराजगी का हौव्वा दिखाकर कांग्रेस के दकियानूसी नेताओं ने विदेश में पढ़े हुए नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी से संविधान संशोधन करवा दिया था। लेकिन मुस्लिम समाज महज मर्दों से बना हुआ नहीं है, और उसकी आधी आबादी महिलाओं की भी है इसलिए भाजपा को आज उत्तरप्रदेश की चुनावी जीत के बाद यह जरूरी लग रहा है कि वह इस मुद्दे को उठाए क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव के पहले से उठाए गए इस मुद्दे के चलते हुए मुस्लिम महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था।
दरअसल कुछ मुद्दों की साख और विश्वसनीयता इस बात को लेकर कम हो जाती है कि उन्हें कौन उठा रहे हैं। कश्मीर से वहां के पंडितों को आतंक और बलात्कार की धमकी देकर अलगाववादियों ने बेदखल कर दिया था, और आज दशकों बाद भी उनकी अपनी ही जमीन पर वापिसी नहीं हो पा रही है। लेकिन इस मुद्दे का हिन्दू-मुस्लिमकरण ऐसा हो गया था कि भारत के वामपंथियों ने, कांग्रेस पार्टी ने कभी इस नाजुक मुद्दे को छुआ नहीं, और यह मुद्दा मानो हिन्दू संगठनों और जनसंघ-भाजपा का मुद्दा होकर रह गया था। यह सिलसिला ठीक नहीं है। किसी एक धर्म से जुड़े हुए लोगों, या कि उस धर्म के महज मर्दों को खुश रखने के लिए उस धर्म की महिलाओं के हक कुचलते चलना ठीक नहीं है। भारत लगातार कई ऐसे फैसले लेते रहा है जो कि दुनिया के कई मुस्लिमों देशों ने भी नहीं लिए। सलमान रूश्दी की किताब पर रोक लगाने वाला भारत दुनिया का पहला देश था। इसी तरह भारत में आकर शरण लेने वाली लेखिका तसलीमा नसरीन को बंगाल में वामपंथियों की सरकार ने या ममता की सरकार ने घुसने की भी इजाजत नहीं दी क्योंकि उन्हें अपनी मुस्लिम आबादी की नाराजगी का ख्याल था।
लोकतंत्र में यह भी जरूरी रहता है कि किसी समाज को उसकी भावनाओं की आक्रामकता से बाहर लाकर लोकतंत्र और आज के वक्त की नजाकत को समझाया जाए। ऐसा परिवार के भीतर भी जरूरी होता है, और देश के भीतर भी जरूरी होता है। अल्पसंख्यक समुदाय को उसके धार्मिक अधिकारों पर कोई बात हमला न लगे, इसलिए नाजायज बातों को भी जारी रखा जाए, यह बिल्कुल ठीक नहीं है। इस देश में कानून की अदालत ने कई मंदिरों और दरगाहों में महिलाओं का दाखिला करवाया है, सतीप्रथा बंद करवाई है, बाल विवाह बंद करवाए हैं। तीन तलाक का मामला पहला धार्मिक मामला नहीं है जिसमें सरकार, संसद, या सुप्रीम कोर्ट की दखल हो रही है, अलग-अलग समय पर कहीं जानवरों की बलि को रोकने के लिए अदालतें सामने आई हैं, तो कहीं आर्य समाज जैसे संगठन ने धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास को रोकने का काम किया है। आज वक्त आ गया है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके हक दिए जाएं, उन्हें बराबरी का दर्जा दिया जाए। इसलिए तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की जरूरत है और इसमें किसी धार्मिकता या साम्प्रदायिकता के तर्क आड़े नहीं आने देने चाहिए। 

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