नक्सल मोर्चे को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारें भारी तनाव में

संपादकीय
30 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के नक्सल-कब्जे वाले इलाके में सड़कों का बनाना फिलहाल थम गया दिखता है क्योंकि केन्द्रीय सुरक्षा बलों के बारे में सरकार की तरफ से कहा गया है कि वे अब सड़क-निर्माण सुरक्षा का काम नहीं करेंगे। इस निगरानी में बहुत सी मौतें हो चुकी हैं, और अब केन्द्र सरकार भारी तनाव से गुजर रही है। केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकार भी इतने जवानों की मौत को लेकर एक तनाव में है, और अभी यह तय नहीं हो पा रहा है कि नक्सल हिंसा खत्म करने के लिए बस्तर में कितनी कड़ी और कितनी बड़ी कार्रवाई की जाए। यह बात तय है कि अगर बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों को झोंककर नक्सलियों को मारने की कोशिश एक फौजी अंदाज में की गई, तो उसमें बड़ी संख्या में बेकसूर आदिवासी भी मारे जा सकते हैं, जो कि इस किस्म के किसी भी मोर्चे पर आम बात रहती है। दूसरी बात यह भी है कि बस्तर का यह हिस्सा पड़ोसी राज्यों से मिला हुआ है, और एक राज्य में अगर सुरक्षा बलों का दबाव बहुत बढ़ता है तो नक्सली सरहद पार करके दूसरे राज्य में चले जाते हैं।
अब नक्सलियों के बहुत सीमित संख्या वाले वैचारिक समर्थकों को छोड़ दें, तो आम जनता का बहुमत इस सोच का है कि फौज को झोंककर नक्सलियों को एकमुश्त खत्म कर दिया जाए। यह आम जनता बस्तर जैसे इलाके के बाहर दूर शहरों में बसी हुई है, वह सोशल मीडिया तक अपने सरोकारों को सीमित रखती है, और वह विचलित होने पर तरह-तरह से ट्वीट करके देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रवाद, और नक्सल-विरोध को जाहिर करती है। यह वह जनता है जो नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच पिसने की नौबत नहीं झेलती है, और अपने घरों में सुरक्षित बैठी हुई वह फौजी कार्रवाई को एक अच्छा विकल्प समझती है। वह ऐसी जनता है जो देश की सरहद पर एक सिर के बदले दस सिर काटकर लाने, और पाकिस्तान पर हमला कर देने की हिमायती भी है। इसी सोशल मीडिया पर एक तबका ऐसा है जिसकी याददाश्त थोड़ी मजबूत है और जो केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को याद दिलाता है कि कुछ बरस पहले ऐसे ही नक्सल हमले के बाद स्मृति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चूडिय़ां भेजने का बयान दिया था, और आज फिर वैसा ही मौका आया हुआ है, तो वे अपनी चूडिय़ों का सदुपयोग करें।
लोकतंत्र में जब जनता का दबाव केन्द्र या राज्य सरकार पर पड़ता है, तो कई बार आहत और विचलित भावनाओं को शांत करने के लिए, कार्रवाई करते हुए दिखने के लिए भी सरकारें कई किस्म की कार्रवाई करती हैं। लोकतंत्र ऐसे जनदबाव से मुक्त भी नहीं रह सकता, लेकिन सत्ता को विपक्ष जैसी कार्रवाई की आजादी भी नहीं रहती है। सत्ता एक अलग किस्म की जिम्मेदारी सिखाती है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस ओहदे पर आने के ठीक पहले तक पाकिस्तान से जितने सिर काटकर लाने की ललकार लगाते आए हैं, अब वे वैसी कोई कार्रवाई न करके अपने को एक अधिक जिम्मेदार राजनेता साबित भी कर रहे हैं। हम किसी की पुरानी बातों को गिनाकर उन्हें उन दावों के मुताबिक आज भी गलत काम करने के लिए उकसाने पर भरोसा नहीं रखते, और चुनावी ललकार को सत्ता में आने के बाद भूल जाना बेहतर रहता है, चाहे वह देश की सरहद हो, या देश के भीतर प्रदेशों की सरहद पर नक्सल हिंसा हो।
छत्तीसगढ़ और केन्द्र सरकार दोनों से यह उम्मीद तो की जाती है कि वे नक्सल हिंसा पर काबू करें, और बेकसूर जवानों की इतनी बड़ी-बड़ी शहादतों को टालने का काम करें, उसे रोकने का काम करें। लेकिन इसके लिए कोई आसान रास्ता नहीं है, और केन्द्र सरकार से हजारों और जवानों की उम्मीद की जा रही है, ताकि नक्सल मोर्चे पर और कड़ी कार्रवाई की जा सके। यह कार्रवाई बहुत से कोलैटरल-डैमेज के साथ ही हो पाएगी, जिसका मतलब है कि बेकसूर इस कार्रवाई में बड़ी संख्या में पिसेंगे। ऐसी नौबत से बचने, अंतहीन खर्च से बचने, और आदिवासी इलाकों में विकास और जनकल्याण जमीन पर लाने के लिए एक दूसरा रास्ता भी सोचना चाहिए, और अपनाना चाहिए, बातचीत का। लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक ताकतों को, हिंसक और आतंकी मुजरिमों को बातचीत की टेबिल तक लाने का जिम्मा लोकतांत्रिक संस्थाओं का होता है, जैसे कि आज नक्सल-प्रभावित राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार का है। यही लोकतंत्र की उपलब्धि होती है कि बंदूकों के साथ-साथ बातचीत का भी इस्तेमाल करके अलोकतांत्रिक ताकतों को लोकतंत्र की मूलधारा में लाया जाए। यही तरीका सबसे कम खून-खराबे का होता है, यही तरीका सबसे सस्ता होता है, और यही तरीका सबसे स्थायी भी होता है। भारत का इतिहास गवाह है कि पिछले कई दशकों में नक्सल हिंसा पर पूरी तरह काबू नहीं हो पाया है, और काबू करने की इस कोशिश में दोनों तरफ की बंदूकों से बड़ी संख्या में बेकसूर मारे गए हैं। ऐसी बेकसूर जिंदगियों को भी ध्यान में रखते हुए सरकारों को नक्सलिायों से बातचीत का रास्ता निकालना चाहिए। ऐसी बातचीत जब होगी, वह सरकारों की और लोकतंत्र की इज्जत बढ़ाएगी। लोकतंत्र में लोकतांत्रिक ताकतों की जिम्मेदारी ही सबसे अधिक होती है। छत्तीसगढ़ चूंकि आज नक्सल हिंसा का केन्द्र बना हुआ है, यहां की सरकार को बंदूकों की कार्रवाई के साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी ढूंढना चाहिए, और इस राज्य के पास पिछले बरसों में एक कलेक्टर के अपहरण के बाद नक्सलियों से समझौता-वार्ता का अनुभव भी है।

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