अलग-अलग राज्यों में भाजपा की अलग-अलग नीतियों का राज

संपादकीय
4 अप्रैल 2017


गौहत्या और बीफ के मामले में देश में शुरू से आक्रामक रही भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दो बरस में देश के अलग-अलग प्रदेशों में अपनी रीति-नीति अलग-अलग रखी है। इसी को लेकर अब भाजपा पर यह ताने कसे जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मम्मी, और उत्तर पूर्व में यम्मी, यानी मजेदार स्वाद वाली। उत्तर पूर्व में भाजपा ने यह साफ किया है कि वह बीफ के खिलाफ नहीं रहेगी। दूसरी तरफ, देश के एक अलग सिरे पर केरल में अभी दो दिन पहले भाजपा के एक लोकसभा-उपचुनाव उम्मीदवार ने सार्वजनिक रूप से मतदाताओं से वायदा किया है कि वे साफ सुथरा बूचडख़ाना मुहैय्या कराएंगे, और लोगों को बीफ हासिल रहेगा। भाजपा के ही राज वाले गोवा में लगातार भाजपाई मुख्यमंत्री कहते रहे हैं, और आज भी कहते हैं कि वहां न बीफ पर रोक लगेगी, न शराब पर। इसके अलावा वहां के पर्यटकों पर पोशाक की भी कोई बंदिश नहीं लगेगी, यह भी साफ किया गया है।
भाजपा के राज वाले अलग-अलग राज्यों में बीफ से लेकर शराब तक, और संस्कृति तक, अलग-अलग तस्वीरें देखने मिलती हैं। मोदी के गुजरात में नवरात्रि पर डांडिया की रातों में लड़कियों की दुस्साहसी पोशाकें देखने मिलती हैं, और यह आम बात रहती है कि नौजवान लड़के-लड़कियां होटलों में घंटों के हिसाब से कमरे लेते हैं। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश में भाजपा का राज आते ही लड़के-लड़कियों को साथ दिखने पर सड़कों और बाग-बगीचों में इस तरह पीटा जा रहा है कि हिंदुस्तान के इतिहास में पे्रम कभी रहा भी न हो। यहां तक कि जवान भाई-बहन भी सड़कों पर पीटे जा रहे हैं, और उन्हें छोडऩे के लिए पुलिस रिश्वत ले रही है। उत्तरप्रदेश से जिस तरह के वीडियो आ रहे हैं, वे भयानक हैं, और लग रहा है कि लोकतंत्र की इस देश में कोई जगह नहीं बची है।
अब अगर भाजपा के खुद के सीधे राज वाले प्रदेशों को देखें, तो वहां पर स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के मुताबिक जिस तरह की विविधता भाजपा अपनी नीति में कर रही है, और सरकारी फैसलों में जैसा फेरबदल कर रही है उसे देखकर लगता है कि जब स्थानीय स्तर पर चुनाव जीतने की बात आती है तो भाजपा इन प्रदेशों में पर्याप्त लचीलापन दिखाती है। लेकिन जब किसी प्रदेश में बहुमत पाने के लिए उसकी नीतियां काफी हैं, तो वह अपनी तंगनीतियों पर कायम रहती है। इस फर्क को समझते हुए देश की विविधता को भी समझना होगा, और एक किस्म के खानपान, एक किस्म के पहरावे, एक किस्म संस्कृति को सब पर लादना बंद करना होगा। यह लोकतंत्र में वैसे भी गैरकानूनी और नाजायज बात है, लेकिन कहीं पर राज्य के कानून बनाकर, तो कहीं पर गैरकानूनी तरीके से सत्ता का संरक्षण देकर जिस तरह की एक सांस्कृतिक तानाशाही लादी जा रही है, वह भारत के लिए ठीक नहीं है। यह समझ लेना चाहिए कि चुनाव में बहुमत पाकर सत्ता में आने का यह मतलब नहीं होता है कि आबादी का बहुमत विविधता वाली आजादी के खिलाफ है। कई बार मुकाबले में खराब उम्मीदवार और खराब पार्टी के रहने से भी चुनाव जीते जाते हैं।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन माखन लाल चतुर्वेदी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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