किसानों की कर्जमाफी और उससे जुड़े हुए दूसरे मुद्दे...

संपादकीय
5 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश में भाजपा सरकार ने अपने वायदे के मुताबिक किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की है, और इससे एक तो पार्टी और दूसरे नए मुख्यमंत्री, इन दोनों की साख बढ़ी है। अब दूसरी तरफ महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने भाजपा की भागीदार शिवसेना ने इसकी तारीफ करते हुए राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री से किसानों की कर्जमाफी महाराष्ट्र में भी मांगी है। आगे-पीछे देश के बाकी राज्यों में भी ऐसी मांग उठने लगेगी, और खासकर भाजपा के शासन वाले राज्य इस गर्मी को कुछ अधिक महसूस करेंगे। एक राष्ट्रीय पार्टी एक राज्य में अलग नीति, और दूसरे राज्य में कोई दूसरी नीति नहीं रख सकती, हालांकि केन्द्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्जमाफी जिस राज्य को करनी है, उसे अपने ही साधनों से यह काम करना होगा, और इसमें केन्द्र कोई मदद नहीं करेगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, एसबीआई की मुखिया ने किसानी-कर्जमाफी को अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया था, और इसका विरोध किया था। देश के अर्थशास्त्रियों में दोनों तरह के लोग हैं, कुछ लोग यह मानते हैं कि जब बड़े-बड़े कारखानेदारों को हजारों करोड़ के कर्ज लेने के बाद दीवालिया होने की छूट दी जाती है, तब छोटे-छोटे किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए उनको ऐसी रियायत क्यों नहीं मिलती?
दुनिया के अधिकतर देशों में किसानों को किसी न किसी तरह की सरकारी रियायत मिलती है, इसकी एक वजह यह भी है कि बाकी तमाम चीजें तो कारखानों में बन सकती हैं, अनाज अभी तक कारखानों में नहीं उग रहा है। इसलिए किसानों का जिंदा रहना बाकी दुनिया के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। भारत में हम देखते हैं कि बाजार में चीजों के दाम सरकार और जनता के काबू के बाहर रहते हैं, सोना कभी आसमान पर चले जाता है, तो कभी धरती पर गिर जाता है, और कारोबारी भी इस पर कोई काबू नहीं रख पाते। लोग महंगे सामान, महंगी गाडिय़ां, महंगे ऐशोआराम में तो मोलभाव नहीं करते, लेकिन फल-सब्जी पर खूब मोलभाव होता है, और किसान को मिलने वाली रियायत या मदद लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाती है। भारत में भी लोगों को यह समझने की जरूरत है कि बाकी चीजों के बिना तो वे कुछ दिन गुजार सकते हैं, लेकिन अनाज के बिना उनका काम नहीं चल सकता। अभी आधी सदी पहले तक की ही बात है जब देश में जरूरत से कम अनाज होता था, और अमरीका से मदद में बहुत रद्दी किस्म का गेहूं आता था, और लोग राशन दुकानों में लाईन में लगकर उसे लेते थे। इसलिए यह याद रखना चाहिए कि अगर किसान जिंदा नहीं रहेगा, तो बाकी आबादी भी जिंदा नहीं रहेगी।
हम किसानी या किसी और किस्म के कर्ज को माफ करने की कोई अंधी वकालत नहीं कर रहे, लेकिन इतना जरूर कह रहे हैं कि अगर सरकार को किसी की भी कर्जमाफी करनी है, तो वह मजदूर, फुटपाथ के व्यापारी, और छोटे किसान होने चाहिए। जो जितना कमजोर है, जो जितना गरीब है, उसे उतनी ही अधिक मदद मिलनी चाहिए, और अब इस पैमाने को कैसे तय किया जाए, कर्जदारों को इस पर कैसे परखा जाए, और कैसे इस मदद को लोगों की लत न बनने दिया जाए, यह सरकार और अर्थशास्त्रियों की बात है। छत्तीसगढ़ में भी हम पिछले बरसों में यह देखते हैं कि सरकार किसानों की लगभग पूरी उपज बाजार से अधिक दाम पर खरीदती है, और गरीब लोगों को बाजार से पांच फीसदी दाम पर अनाज देती है। ये दोनों किस्म की सब्सिडी खासा बड़ा बोझ है, लेकिन इन्हीं दोनों के चलते हुए किसानों की आत्महत्या किसानी की वजह से, कर्ज की वजह से, कम सुनाई देती है, और भूख-कुपोषण की वजह से लोगों की भुखमरी अब इस राज्य में बिल्कुल भी सुनाई नहीं पड़ती। जब कभी एक व्यापक नीति के तहत पूरे राज्य स्तर पर किसी तबके की मदद करनी है, तो उसकी बारीक छानबीन भी होनी चाहिए, क्योंकि यह जनता के हक का पैसा रहता है, और इसे महज लुभावनी राजनीति के लिए लुटाना ठीक नहीं है। गरीबी और मुसीबत, कर्ज न चुका पाने की हालत, इन सबको परखने का अच्छा पुख्ता इंतजाम होना चाहिए, और उसके बाद जहां जरूरत हो, वहां मदद जरूर करनी चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें