भारत की जमीन पर विदेशियों से बुरे सुलूक के लंबे नतीजे

संपादकीय
6 अप्रैल 2017


दिल्ली से लगे उत्तरप्रदेश के नोएडा में कुछ दिन पहले एक अफ्रीकी नागरिक को एक मॉल में इस बुरी तरह पीटा गया कि उसका वीडियो देखते भी नहीं बनता था। लेकिन दिल्ली शहर में भी कुछ बरस पहले ऐसी वारदातें हुई हैं, और उस वक्त भी अफ्रीका के इन देशों ने इसका विरोध किया था। अब अफ्रीकी देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी इसे नस्लवादी हमला बताते हुए शिकायत की है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पर आपत्ति की है, और कहा है कि भारत के भीतर की इस घटना को लेकर संयुक्त राष्ट्र क्यों जाना चाहिए। पहले भी भारत के कुछ इलाकों में कुछ विदेशी नागरिकों के साथ हिंसा हुई है, और उसकी भी प्रतिक्रिया पर्यटकों के आने में कमी के अलावा भी कई और तरह से हुई।
भारत में विदेशियों के साथ बुरा सुलूक करने वाले लोगों को यह समझ नहीं रहती कि उन देशों के साथ भारत के संबंधों पर इसका क्या असर पड़ता है, भारत की साख पर इसका क्या असर पड़ता है, और सबसे बड़ी बात यह कि उन देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानियों को इससे क्या-क्या खतरे झेलने पड़ते हैं। अफ्रीका में पहले भी कई देशों से हिन्दुस्तानियों को भगाया जा चुका था, और उन्हें अपना कारोबार छोड़कर निकलना पड़ा था। यह बात जाहिर है कि दूसरे देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानी भारत के लिए एक बड़ी कमाई भी करते हैं, और वे वहां पर भारत के अघोषित प्रतिनिधि भी रहते हैं। ऐसे में आज यह मुद्दा भी उठ रहा है कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत जिस सदस्यता के लिए दशकों से कोशिश किए जा रहा है, उसके लिए अफ्रीकी देशों का समर्थन उसके लिए बहुत मायने रखता है, और अगर वहां से आकर भारत में पढ़ रहे छात्रों के साथ ऐसी हिंसा होती है, तो इससे संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के महत्व पर खतरे खड़े होंगे।
हिन्दुस्तान में बसे हुए इस देश के लोगों में से जिन लोगों के रिश्तेदार दूसरे देशों में काम करते हैं, या रहते हैं, वे शायद ही कभी विदेशियों के साथ इस तरह की हिंसा करेंगे क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने घरवालों पर खतरे साफ दिखते रहेंगे। जो लोग दुनिया के दूसरे देश घूमने जाते हैं, वे लोग भी ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें बाहर अपने साथ भी ऐसे सुलूक का खतरा दिखेगा। लेकिन दुनिया से कटे हुए, अनजान, एक सुरंग या कुएं जैसी सीमित सोच और समझ रखने वाले लोग अपनी भीड़ की ताकत से ऐसी हिंसा पर उतर जाते हैं, और उसका नुकसान लंबे समय तक इस देश को और यहां से बाहर जाकर काम करने वाले लोगों को झेलना पड़ता है।
विदेशी नागरिकों के अलावा एक और बात जो भारत के लोगों की साख को दूसरे देशों में लगातार घटाती है, वह है यहां धर्म या जाति के नाम पर, लोगों के साथ की जाने वाली हिंसा। गौरक्षक बनकर जो लोग गाय लेकर जाते किसी भी मुस्लिम या दूसरे धर्म के लोगों को सड़कों पर मार डाल रहे हैं, वे गाय को नहीं बचा रहे हैं, वे इस देश की एक संभावना को मार रहे हैं। गाय को ही बचाने की ताकत अगर ऐसे स्वघोषित गौरक्षकों में होती, तो फिर बात ही क्या थी। गाय तो जैसे ही दूध देना बंद करती है, उसके लिए जिंदा रहने को खाने के लिए महज घूरे बच जाते हैं। अपनी मां कही जाने वाली गाय को इस तरह लंबी जिंदगी के लिए कचरे पर जीने की बेबसी देने वाले लोग एक पाखंडी धार्मिक कट्टरता दिखाते हुए भीड़ की ताकत से हिंसा करते हैं, और पूरी दुनिया में इस देश का नाम बदनाम करते हैं। इसलिए न सिर्फ दूसरे देशों से आए हुए विदेशी नागरिक, बल्कि अपने देश के नागरिकों के साथ भी ऐसी सार्वजनिक हिंसा हिन्दुस्तान को बहुत पीछे कर दे रही है। आज अगर सरकार को विदेशों से संबंध और कारोबार का नुकसान दिखाई नहीं दे रहा है, तो मोदी सरकार के इस कार्यकाल के भीतर ही यह दिखने लगेगा। आज जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक नस्लवादी और हिंसक अंदाज में विदेशियों के साथ अमरीकी धरती पर भेदभाव कर रही है, तो भारत के पास इसके खिलाफ बोलने के लिए मुंह भी नहीं बचता है क्योंकि यह देश अपने आपमें ऐसा ही कर भी रहा है। भेदभाव और हिंसा के खिलाफ मुंह खोलने के लिए जो नैतिक ताकत लगती है, उसे भारत अपनी घरेलू हिंसा की ऐसी घटनाओं के साथ खोते चल रहा है।

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