मोदी बिना ट्रैफिक रोके दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे!

संपादकीय
7 अप्रैल 2017


दिल्ली पहुंचीं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना ट्रैफिक को रोके हुए अघोषित तरीके से एयरपोर्ट पहुंचे। यह एक अलग बात है कि यह कदम आम शिष्टाचार नियमों से ऊपर था, और बांग्लादेश को एक अलग महत्व देने वाला था, लेकिन उससे भी अलग बात यह है कि मोदी ने यह दिखा दिया कि दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में भी प्रधानमंत्री आम लोगों के ट्रैफिक के बीच से उसी तरह निकलकर जा सकता है। पिछले कुछ हफ्तों में पंजाब के मुख्यमंत्री का यह फैसला सामने आया है कि वे गाडिय़ों में लालबत्ती नहीं लगाएंगे, और सादगी की इस पहल पर हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह लिखा भी है। लेकिन अब प्रधानमंत्री की इस पहल के बाद अब देश के बाकी मुख्यमंत्रियों और केन्द्र के मंत्रियों के सामने भी यह एक नैतिक दबाव रह सकता है कि वे भी ऐसा करें।
आज भारतीय लोकतंत्र में नेता जनता से कटते चले गए हैं, और जनता के मन में नेताओं के ठाठ-बाट देखकर हिकारत बढ़ती चली जा रही है। इसलिए यह जरूरी है कि जनता के बुनियादी हकों को कुचलने का काम खत्म किया जाए। दो ही दिन पहले एक वीडियो आया है जिसमें एक एम्बुलेंस में कोई मरीज दम तोड़ते दिख रहा है, और उसे रियायती कार-काफिले के लिए रोक दिया गया है। प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह एक बार जब चंडीगढ़ गए थे तो वहां के सबसे बड़े अस्पताल, पीजीआई, में कार्यक्रम था, और चारों तरफ एम्बुलेंस दूर-दूर रोक दी गई थीं, और भयानक नजारा मीडिया में सामने आया था। दुनिया के जितने सभ्य लोकतंत्र हैं, वहां पर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बिना ऐसे काफिलों के निकल जाते हैं, और योरप के तो कई ऐसे देश हैं जिनमें प्रधानमंत्री साइकिल से दफ्तर आते-जाते हैं। भारत में ही मुगलों और अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही सामंती सोच खत्म नहीं होती है, और सुरक्षा-जरूरतों से आगे बढ़कर लोग अपनी शान-शौकत के लिए बड़े-बड़े काफिले लेकर चलते हैं, और शायद सरकार के भीतर की फाइलों में इसे सही ठहराने के लिए अपनी सुरक्षा पर खतरा भी लिखवा लेते हैं।
यह सिलसिला थमना चाहिए, लेकिन जनता इसे लेकर अदालत भी नहीं जा सकती। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज खुद भी लालबत्तियों लगी हुई गाडिय़ों में, और कम से कम छत्तीसगढ़ में हमें दिखता है कि पुलिस की सायरन बजाती पायलट गाड़ी के साथ चलते हुए गुजरते हैं। उनका हाल यह रहता है कि फायर ब्रिगेड की तरह उन्हें अदालत पहुंचकर तुरंत ही बेइंसाफी की आग बुझानी है, यह एक अलग बात है कि मामले पूरी-पूरी पीढ़ी तक अदालत में घिसटते रहते हैं, और जजों के लिए ट्रैफिक रोक दिया जाता है। लोकतंत्र में सामंतवाद का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट का कोई जज अगर लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाला आए, तो उसे तुरंत यह बात समझ आएगी कि जजों को लालबत्ती और सायरन की कोई जरूरत नहीं रहती है, और उन्हें सरकार के सामने, नेताओं के सामने एक मिसाल रखनी चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 1650वीं बुलेटिन - पंडित रवि शंकर में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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