एक के बाद एक कई देशों में हिन्दुस्तानी कामगार दिक्कत में

संपादकीय
24 अप्रैल 2017


ब्रिटेन से खबर आई है कि वहां दो कारखानों में छापे के दौरान 38 हिन्दुस्तानियों को हिरासत में लिया गया जो कि वीजा का वक्त खत्म होने के बाद वहां बने हुए थे। यह खबर एक हफ्ते में भारतीय कामगारों से जुड़ी तीसरी निराशाजनक खबर है। पहले भारत आकर ऑस्ट्रेलिया लौटे वहां के प्रधानमंत्री ने वापिस घर पहुंचते ही हिन्दुस्तानियों पर कड़े वीजा प्रतिबंध की घोषणा की, उसके बाद अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय कामगारों के वीजा नियमों को और कड़ा किया। और अब ब्रिटेन की यह खबर। ये तीनों देश भारतीय कामगारों के लिए बड़ी जगह हैं, और अगर वहां उनका काम कम होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को भी एक नुकसान पहुंचेगा, और वहां पर जमे जमाए काम वाले इन लोगों की हालत भी डांवाडोल होगी।
भारत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम सम्हालने के बाद से लगातार विदेशी मोर्चे पर एक अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई, और बहुत सी खबरें पाईं। लेकिन जिन देशों के साथ भारत को फायदा होते दिखा, उनमें कई देश तो ऐसे थे जिनको भारत से बहुत बड़ा कारोबारी फायदा हो रहा था, और उनसे भारत को महत्व मिलना स्वाभाविक ही था। दूसरी तरफ अमरीका के साथ भारत के जो अच्छे संबंध ओबामा के रहते दिख रहे थे, उनका कोई फायदा अभी दिख नहीं रहा है। नए राष्ट्रपति ट्रंप के आने के बाद भी हिन्दुस्तानियों के वहां काम करने को लेकर नई दिक्कतें बढ़ रही हैं, और भारत की सरकार इसमें कुछ भी करने की हालत में नहीं दिख रही है। अमरीका की मौजूदा सरकार का जो रूख है वह भारत के सीधे-सीधे खिलाफ न होने पर भी इतना तो है ही कि वह भारत को किसी प्राथमिकता में नहीं रख रहा है। उसके निशाने पर वैसे तो आधा दर्जन मुस्लिम देश हैं, लेकिन ट्रंप की चुनावी घोषणाओं में ही यह शामिल था कि किस तरह विदेशी लोगों से रोजगार वापिस लेकर अमरीकी लोगों को काम मुहैया कराया जाएगा। फिलहाल ट्रंप के आने के बाद से अब तक भारत सरकार का अमरीका के साथ किसी असरदार बातचीत का कोई संकेत नहीं है। अमरीका में भारतवंशीय लोगों पर नस्लवादी हमले हुए, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने, या विदेश मंत्री ने इस पर एक ट्वीट करने की भी पहल नहीं की। इससे जाहिर है कि भारत का फिलहाल कोई असर अमरीकी सरकार पर नहीं है, प्राथमिकता की बात तो दूर रही।
ऐसी नौबत में एक बात साफ दिखती है कि भारत को आगे-पीछे यह जरूर सोचना पड़ेगा कि वह दूसरे देशों में मजदूरी के काम के बजाय अपने खुद के देश में ऐसे लोगों को रोजगार या कारोबार के लिए कैसे बढ़ाए? वैसे तो स्टार्टअप से लेकर मेक इन इंडिया तक कई तरह के नारे पिछले एक बरस में केन्द्र सरकार ने उछाले हैं, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था में इन नारों का असर नहीं दिख रहा है। केन्द्र सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि इस देश के माहौल में आदिम युग जैसी जो अलोकतांत्रिक हिंसा बढ़ती जा रही है, क्या उसकी वजह से पूंजीनिवेश से लेकर दूसरे देशों से लोगों का भारत आना तक घट रहा है? यह एक आसान नौबत नहीं है क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह मंदी से गुजर रही है, और आज तो हिन्दुस्तान का काम सस्ते तेल की वजह से खिंच रहा है, आगे चलकर हिन्दुस्तानियों के रोजगार संपन्न पश्चिमी देशों में घटते जाएंगे तो क्या होगा? 

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