तरूण विजय से परे भी रंगभेद पर खुली चर्चा की जरूरत...

संपादकीय
8 अप्रैल 2017


भारतीय जनता पार्टी सांसद और आरएसएस के अखबार पांचजन्य के संपादक रहे हुए तरूण विजय के लिए टीवी पर बोलना या अखबारों में लिखना कोई नई बात नहीं है, वे लगातार मीडिया से मुखातिब रहते हैं, और उनसे हड़बड़ी या दबाव में कुछ गलत कहने की उम्मीद नहीं की जाती है। ऐसे में जब उन्होंने भारत में विदेशी अश्वेतों पर हुए हमलों पर चल रही एक टीवी बहस में कहा कि भारत में कोई नस्लवाद या रंगभेद नहीं है, और इसके सुबूत के रूप में उन्होंने यह कहा कि भारतीय, दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं, उन्होंने कहा कि अगर भारतीय नस्लवादी होते तो वे दक्षिण भारतीयों के साथ कैसे रह पाते? उनकी इस बात में एक-दो शब्द इधर-उधर हो सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने भारत के रंगभेदी न होने के सुबूत के रूप में अपने दिमाग के रंगभेद को पेश कर दिया। अब आज का सोशल मीडिया का वक्त ऐसा है कि ऐसा कहकर किसी का बच निकलना तो मुमकिन हो नहीं सकता, इसलिए ट्विटर पर उनकी वह धुलाई हो रही है कि उन्हें खुद अपनी इस गलत बात पर बार-बार, लगातार माफी मांगनी पड़ रही है।
दरअसल दिमाग में जो सोच रहती है, वह कभी-कभी इस तरह से सामने आ भी जाती है। भाजपा के एक बड़े पुराने और जाने-माने चेहरे के रूप में तरूण विजय की यह बात दक्षिण भारतीयों के लिए अपमानजनक तो है ही, इससे उनकी यह सोच भी सामने आती है कि दक्षिण भारत मानो भारत का हिस्सा ही न हो। भाजपा के ये राज्यसभा सदस्य हों, या कि कोई और, एक बात यह समझ लेनी चाहिए कि दिल्ली पर उत्तर-पूर्व का, दक्षिण भारत का, या कि कश्मीर का उतना ही हक है, जितना कि उत्तर भारत का है। कश्मीर के लोगों को हमेशा से यह शिकायत रहते आई है कि बाकी हिन्दुस्तान के लोग कश्मीर को अलग-थलग गिनकर चलते हैं, और इसकी प्रतिक्रिया में कश्मीर के लोग भी अपने आपको कश्मीर और बाकी भारत को इंडिया कहते हैं। इसी तरह उत्तर-पूर्व की चर्चा भी बाकी हिन्दुस्तान के लोग इसी अंदाज में करते हैं कि उधर वह उत्तर-पूर्व है, और बाकी हिन्दुस्तान है। उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ देश में जगह-जगह भेदभाव होता है, दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक उन पर हमले होते हैं, और ऐसी घटनाओं से वहां के लोग बाकी देश की मूलधारा के साथ जुड़ नहीं पाते, या कि बाकी देश अपनी मूलधारा में ऐसी सरहदी राज्यों को, वहां के लोगों को जोडऩा नहीं चाहता।
तरूण विजय ने जो कहा है, वह हिन्दी फिल्मों में आधी सदी से भी अधिक से चली आ रही एक रंगभेदी सोच है जिसमें किसी दक्षिण भारतीय को दिखाने के लिए उसे एकदम काले रंग का दिखाया जाएगा, उसकी हिन्दी को टूटी-फूटी और बेहूदी बनाया जाएगा, उसे लुंगी पहना दी जाएगी, और उसे मद्रासी कहा जाएगा। भारत में रंगभेद की जड़ें समाज में इतनी गहरी हैं कि शादियों के विज्ञापनों में बहुत से ऐसे रहते हैं जिनमें गोरे रंग की शर्त जुड़ी रहती है। इस देश में गोरे बनाने की क्रीम का बहुत बड़ा बाजार है, और बड़े-बड़े फिल्मी सितारे इसे बेचने का काम करते हैं। काले रंग के लिए देश के बहुत से लोगों के मन में एक हिकारत है, और किसी का जिक्र करते हुए उसे काली-कलूटी कहा जाता है। ऐसे देश में जब काले रंग का इस्तेमाल विरोध करने के झंडों में होता है, किसी आंदोलन करने के लिए कपड़ों पर काली रिबन बांध ली जाती है, काले बैनर लगाए जाते हैं, तो काले रंग को एक नकारात्मक रंग की तरह पेश करने का काम भी होता है। लोग बोलचाल में यह कहते हैं कि फलां के काम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होंगे, काला अक्षर भैंस बराबर, यह बात अपमान के रूप में कही जाती है, हालांकि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि गोरी गाय पढ़ी-लिखी होती है।
तरूण विजय ने एक बहुत ही शर्मनाक बात कही है, और उसके लिए लोकतंत्र में माफी मांग लेने, और माफ कर देने के अलावा कोई बहुत अधिक विकल्प नहीं बचते हैं, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में फतह पाने की उम्मीद लगाई हुई भारतीय जनता पार्टी को वहां नुकसान पहुंचाने के लिए, गोमांस के विवाद के बाद अब यह काले रंग का विवाद और जुड़ गया है, और आने वाले चुनावों में दक्षिण में इसका क्या मुद्दा बनता है, यह देखना होगा। लेकिन हमारा यह मानना है कि तरूण विजय के इस विवाद के साथ अब हिन्दुस्तान के भीतर के रंगभेद पर खुलकर चर्चा हो ही जानी चाहिए।

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