अंग्रेजों के मैले के टोकरे ढोना बंद करना चाहिए

आजकल
3 अप्रैल 2017 

अभी एक साधारण से विश्वविद्यालय में हुए एक सरकारी समारोह में जाना हुआ, तो पूरा सभागृह तो ठंडा नहीं था, लेकिन स्टेज पर दोनों तरफ बड़े-बड़े टॉवर-एसी लगा दिए गए थे, ताकि मंच पर सूट-बूट और टाई में जकड़े हुए लोग चैन से बैठ सकें। इन दिनों बड़ी-बड़ी आमसभाओं में भी जहां लोग चिलचिलाती धूप में घंटों बैठते हैं, वहां कुछ देर के लिए मंच पर आने वाले लोगों के लिए भी किनारों पर इस तरह एसी लगाए जाते हैं कि नीचे के लोगों को न दिखें। और ऐसे तमाम मंचों पर लोग या तो जॉकेट और कोट में रहते हैं, या टाई पहने रहते हैं, बूट तो पहने ही रहते हैं।
दूसरी तरफ अभी कुछ दिन पहले खबर आई कि बढ़ती हुई गर्मी को देखते हुए छत्तीसगढ़ की अदालतों में वकीलों के काले कोट पहनने पर कुछ समय के लिए छूट दी गई है। लेकिन हम रोज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तस्वीरें खबरों में देखते हैं जिनमें वकील काले कोट से लदे हुए दिखते हैं, और जज तो पता नहीं कैसे जादूगरों से काले लबादे भी ओढ़े हुए रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में शायद कुछ या सभी वकीलों को अदालत के भीतर जजों के सामने ऐसे लबादे भी ओढऩे होते हैं। 
रेलवे स्टेशनों पर देखें तो टीटीई भरी गर्मी में, खुले प्लेटफॉर्म पर भी काले कोट से लदे रहते हैं, और सरकारी कार्यक्रमों में एसी हॉल में पहुंचने वाले अफसर, एसी कार से जाते हुए सूट-बूट और टाई में रहते हैं। कारोबार की दुनिया में जो बड़े लोग रहते हैं, उनसे भी यह उम्मीद की जाती है कि वे इसी तरह की पोशाक में रहें जो कि हिन्दुस्तान जैसे देश के लिए न बनी थी, और न ही आज काम की है। 
हिन्दुस्तान के इतिहास की तस्वीरों को अगर देखें तो लखनऊ, बनारस, और कोलकाता के असली रईस लोग कुछ सौ बरस पहले हिन्दुस्तानी मौसम के लिए माकूल धोती-कुर्ते या पजामे में दिखते थे, और ठंड के मौसम में जरूरत के मुताबिक जाकिट पहन लेते थे। शायद अंग्रेजों के आने के बाद से इस तरह की पोशाक का चलन बढ़ चला जिसे कि अंग्रेज पहनते थे अपने देश में, लेकिन वे जब यहां आए तो वे वही पोशाक जानते थे। फिर एक शासक अपने गुलाम देश की पोशाक तो अपना भी नहीं सकता था, इसलिए अंग्रेज यहां की गर्मी में भी अपने ही अंग्रेजी कपड़ों में बने रहे, और चूंकि शासक समाज के स्तर के पैमाने तय करता है, इसलिए उसके नीचे के सारे गुलाम हिन्दुस्तानी वैसे ही कपड़ों का इस्तेमाल करने लगे, और हिन्दुस्तान जैसी भयानक गर्म जगह में भी लोग कोट और टाई पहनने लगे। 
नतीजा यह हुआ कि आज गली-मोहल्लों में खुलने वाली छोटी-छोटी अंग्रेजी स्कूलों के छोटे-छोटे बच्चों के गलों में भी दुमछल्ले की तरह एक टाई टांग दी जाती है, और मैनेजमेंट जैसी महंगी पढ़ाई करवाने वाले कॉलेज या इंस्टीट्यूट एक महंगा माहौल बनाने के लिए गर्म शहरों में भी छात्र-छात्राओं को कोट और टाई में बांधकर रखने लगे हैं। 
यह पूरा सिलसिला निजी प्रताडऩा का तो है ही, इसकी वजह से देश की बाकी जनता का भी एक बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। गर्म जगह या गर्म मौसम में सरकार, राजनीति, अदालत, या जनता के पैसों पर चलने वाले दूसरे पेशों में लोग जब गर्म कपड़े पहनकर बैठते हैं, तो जाहिर है कि वे कमरों को बेहद ठंडा बनाकर रखते हैं, ऐसे कपड़ों के बिना जितने ठंड की जरूरत न पड़ती हो, उतना ठंडा। नतीजा यह होता है कि जनता के पैसों की बिजली अंग्रेजों की छोड़ी हुई उतरन को ढोने के लिए खर्च हो रही है, और देश का एक बड़ा हिस्सा जब एक पंखे की बिजली भी नहीं पाता है, तब देश का यह चुनिंदा शासक वर्ग कोट और टाई के भीतर भी बदन को ठंडा रखने के लिए अंधाधुंध एयरकंडीशनिंग का इस्तेमाल करता है। 
पिछली यूपीए सरकार के वक्त केन्द्र में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने जब दिल्ली में अपने मंत्रालय की इमारत बनवाना शुरू किया, तो उन्होंने पहली शर्त यह रखी कि यह इमारत साल भर में बिजली का शून्य उपयोग करेगी। अगर कुछ महीनों में कुछ बिजली लेगी, तो बाकी महीनों में उससे ज्यादा बिजली सौर ऊर्जा से बनाकर उसे इलेक्ट्रिक ग्रिड में वापिस लौटा देगी। उन्होंने इमारत डिजाइन करने वाले लोगों को उसे ठंडा रखने के लिए कई तरकीबें बताईं, और ठंड में गर्म रखने के लिए भी कई तकनीकों का इस्तेमाल करवाया। इसके साथ-साथ उन्होंने दफ्तर और मीटिंग-रूम्स का तापमान 27 डिग्री से नीचे न रखने के लिए इंतजाम करवा दिया। उनका कहना था कि लोग गर्मी में भी कोट और टाई पहनकर काम करते हैं, इससे ज्यादा अच्छा है कि वे कोट-टाई टांग दें, और साधारण कपड़ों में कम ठंड के बीच काम करें। 
कहने में यह बात छोटी लगती है कि अदालतों और सरकारी दफ्तरों, या जनता के पैसों पर मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल करने वाले लोग अगर इस देश के वातावरण, यहां की गर्मी-ठंडी के मुताबिक कपड़े पहनें तो काफी बचत हो सकती है। सरकारी बचत से परे निजी दफ्तरों और घरों में भी ऐसी बचत हो सकती है क्योंकि बिजली की कमी तो देश भर में है, और बिजली को बचाने का मतलब पर्यावरण को बचाना भी है। 
ठीक इसी तरह का एक दूसरा मुद्दा यह भी दिखता है कि लोग अपने घरों के खुले आंगन, छतों पर, और दीवारों या बाल्कनी में ऐसे पौधे लगा देते हैं, ऐसे लॉन लगाते हैं जो कि खूब पानी पीते हैं। फिर इन्हें जिंदा रखने के लिए लोग बहुत सा पानी इंतजाम करके लाते हैं, और हरियाली की वजह से पर्यावरण-प्रेमी कहलाते हैं। बहुत से लोग तो ऐसी असंभव किस्म की घरेलू हरियाली की वजह से पर्यावरण के पुरस्कार भी पा लेते हैं। हकीकत यह है कि जिस देश-प्रदेश में जैसे पेड़ लगने चाहिए वह तो कुदरत ने ही बता दिया है। लेकिन लोग अपनी जगह से हटकर दूसरी तरह के पेड़-पौधे लगाकर लोग एक अनोखापन दिखाते हैं, और वाहवाही पाते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए वे कुदरत के खिलाफ जाकर कई तरह के खर्च करते हैं, और पानी खर्च करके कुदरत को ही बर्बाद भी करते हैं। ऐसा ही हाल उन लोगों का रहता है जो गर्म इलाकों में ऐसे कुत्ते पालते हैं जो कि ठंडे इलाकों की नस्लों के रहते हैं, और अपने बड़े-बड़े बालों की वजह से, ठंड की अपनी जरूरत की वजह से वे गर्मी में बदहाल रहते हैं, उन्हें रखने के लिए कूलर और एसी पर बिजली पर खर्च की जाती है, उन्हें नहलाने में ढेरों पानी खर्च होता है, और वे दिखावटी नस्ल के ऐसे प्राणी बनकर रह जाते हैं जो खुद भी तकलीफ पाते हैं, पर्यावरण पर भी बोझ रहते हैं, और वे महज सजावट के सामान की तरह, एक महंगे सामान की तरह साबित होते हैं। 
आज जब पर्यावरण के लिए लोगों में एक जागरूकता आ रही है, और जिम्मेदारी का एक एहसास हो रहा है, तो इन कुछ बातों को छोडऩा जरूरी है। भारत में मुगलों के वक्त तो गर्म पोशाकों की ऐसी नकल नहीं हुई, लेकिन अंग्रेजों के वक्त से तो जो नकल शुरू हुई, वह आज तक खत्म नहीं हुई। लोग इस बात को भी नहीं समझ रहे हैं कि एप्पल कंपनी खड़ी करने वाले स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक बनाने वाले मार्क जुकरबर्ग तक अनगिनत ऐसे खरबपति लोग हैं जिनकी सूट-बूट में शायद ही कोई तस्वीर दिखती हो। जो अपनी कंपनी के सबसे बड़े जलसे में भी टी-शर्ट और जींस में मंच पर रहते हों। इसलिए पोशाक की गुलामी-सोच से छुटकारा पाने की जरूरत है, और अपने इलाके के मौसम के मिजाज के मुताबिक कपड़े पहनकर धरती को बचाने की जरूरत भी है। 
कुछ महीने पहले जब छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बस्तर आए तब एक जिले के कलेक्टर को राज्य सरकार से इस बात के लिए नोटिस दिया गया कि उसने प्रधानमंत्री की अगवानी करते हुए परंपरागत पोशाक-नियम का पालन नहीं किया, और बंद गले का कोट नहीं पहना। हमारा ख्याल है कि भयानक गर्मी के बीच खुली धूप में बंद गले का कोट पहनने का नियम बनाना भी मानवाधिकार के खिलाफ है, और किसी को इस बात को चुनौती देनी चाहिए। इस अफसर को मिले नोटिस में यह भी जिक्र था कि उसने धूप का चश्मा लगा रखा था। हकीकत यह है कि तेज धूप में धूप का चश्मा लगाने की सिफारिश चिकित्सा विज्ञान करता है, और यह हिन्दुस्तान जैसा देश ही सोच सकता है कि धूप का चश्मा लगाना बेअदबी है। 
अंग्रेजों के छोड़े हुए इस टोकरे को ढोना बंद करना चाहिए, और हिन्दुस्तान को अपने आपमें एक देश की तरह जीने का आत्मविश्वास दुबारा हासिल करना चाहिए। जब भयानक गर्मी में लोग परेशान हों, तब किसी भी तरह की कोट या जाकिट क्यों इस्तेमाल की जाए? और खासकर जनता के पैसों पर? और खासकर इस देश में जहां एक बड़ी आबादी बिजली के बिना अंधेरे में, गर्मी में रहती है, और काम के औजार भी नहीं चला पाती है। अंग्रेजों के मैले के टोकरे ढोना बंद करना चाहिए। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सैम मानेकशॉ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है।कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. सहमत आपकी बात से .... दुबारा से निर्धारित होना चाहिए ड्रेस कोड ... अंग्रेजों की गुलामी के प्रतीक मिटने चाहियें ...

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  3. बिलकुल सही कहा है आपने, देश और काल के हिसाब से ही पोषाक पहननी चाहिए न कि दिखावे के लिए.. स्थानीय वस्तुओं का इस्तेमाल ही हर तरह से लाभदायक है

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