बस्तर में खड़ा एक बड़ा सवाल, पुलिस-प्रशासन, अब कैसे हों?

संपादकीय
26 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के ताजा हमले के बाद राज्य सरकार में कई तरह के विचार-विमर्श चल रहे हैं, और जनता के बीच जो लोग जानकार हैं, वे भी यह सोच रहे हैं कि इस नक्सल हिंसा का खात्मा कैसे हो। अभी राज्य और केन्द्र सरकार दोनों ही इसी पखवाड़े दिल्ली में बैठकर इस पर विचार करने जा रहे हैं, और केन्द्रीय गृहमंत्री की इस बैठक में बाकी नक्सल प्रभावित राज्य भी शामिल होंगे। जो लोग लोकतंत्र के संघीय ढांचे के भीतर राज्य में जिला या संभाग स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था को जानते हैं, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को समझते हैं वे बस्तर जैसे इलाके की मौजूदा व्यवस्था में किसी नई सोच को सामने रख सकते हैं।
बस्तर में एक तो पुलिस की व्यवस्था की बात है जिसमें राज्य और केन्द्र सरकार के सुरक्षा बल मिलकर काम कर रहे हैं, और एक किस्म से नक्सल मोर्चे को केन्द्रीय सुरक्षा बल ही मोटेतौर पर सम्हाल रहे हैं। वह एक अलग रणनीतिक योजना और मोर्चा है, और उस पर अधिक चर्चा यहां पर मुमकिन नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राज्य के प्रशासनिक ढांचे और जमीनी स्तर की सरकारी व्यवस्था को देखें तो बस्तर में सुधार की असीमित संभावनाएं दिखती हैं, और अगर इस दिशा में काम किया गया होता तो हो सकता है कि नक्सलियों को सरल आदिवासियों के इस इलाके में पांव जमाने का मौका भी नहीं मिला होता, और वे शायद यहां आते भी नहीं। और यह बदहाली अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से दशकों से चली आ रही है, और राज्य बनने के बाद भी पिछले डेढ़ दशक में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।
जब कभी ऐसी कोई बड़ी घटना होती है तो आमतौर पर एक बड़े फेरबदल की चर्चा होने लगती है, और एक नई व्यवस्था की बात भी उठती है। लेकिन सवाल यह है कि चली आ रही मौजूदा व्यवस्था की बुनियादी खामियों के पीछे की वजहों को देखे बिना, उस नाकामयाबी को दूर किए बिना, महज इसलिए कोई नई व्यवस्था लागू की जाए कि उसकी आड़ में पुरानी नाकामयाबी छुप जाए, तो इसका कोई लंबा असर या लंबा फायदा नहीं मिल सकता। बस्तर में हो सकता है कि सरकार का एक तबका पुलिस और प्रशासन दोनों स्तर पर और अधिक अधिकार रखने वाले और बड़े अफसरों की तैनाती की बात सोचें, लेकिन जहां पर गिरावट और खामी जमीनी स्तर पर है, सरकार के सबसे निचले स्तर पर भी जहां काम गड़बड़ा गया है, वहां पर कलेक्टर और कमिश्नर जैसे बड़े अफसरों के ऊपर और किसी अफसर को बिठा देने से जमीनी हालात बेहतर होते नहीं दिखते। अब सरकार के भीतर प्रशासन की बेहतर समझ रखने वाले लोग हो सकता है कि कोई एक ऐसा मॉडल सोच लें जो कि निचले स्तर पर भी प्रशासनिक सुधार ला सके, लेकिन प्रशासनिक सुधार के लिए प्रशासन के ढांचे को ऊपर-ऊपर और अधिक भारी करना पता नहीं एक समझदार विकल्प होगा या नहीं?
यह बात जरूर है कि छत्तीसगढ़ में सरकार को पुलिस के हथियारबंद मोर्चे से परे भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर बनाने के बारे में सोचना होगा, और बस्तर के अलावा भी ऐसी सोच बाकी जगहों पर काम आ सकती है। राज्य सरकार ने पिछले बरसों में बस्तर और सरगुजा के लिए दो अलग विकास प्राधिकरण बनाकर उनकी बैठकें इन्हीं इलाकों में करके इन्हें मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की मौजूदगी में सर्वोच्च प्राथमिकता देकर वहां से जुड़े हुए फैसलों पर तेजी से अमल करवाया है, लेकिन अब यह जाहिर है कि वह कोशिश काफी नहीं हुई, और जनता से आने वाली बात तो यह बताती है कि नीति, कार्यक्रम, और योजना बनाने का जमीनी भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना नहीं रहता है। छत्तीसगढ़ में सरकार का कामकाज जिस बुरी तरह भ्रष्टाचार का शिकार है, उसके सुबूत खुद सरकार की एजेंसियों के छापे में दिखता है।
बस्तर में पुलिस ने पिछले बरसों में जो जुल्म और ज्यादतियां की थीं, उनका नुकसान सरकार अभी तक झेल रही है, और यह आगे भी जारी रहेगा। इसी तरह जो प्रशासनिक खामियां सरकार के निचले स्तर पर हैं, उनको सुधारने के लिए पता नहीं बस्तर में और अधिक बड़े अफसर की जरूरत है, या मौजूदा ओहदों पर ही बेहतर और संवेदनशील अफसरों की जरूरत है जो कि अपने नीचे के अमले को सुधार सकें, और आदिवासियों का विश्वास जीत सकें। बस्तर पहले ऐसे अफसर देख भी चुका है।

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