शहरी सफाई में इस प्रदेश में अच्छी और बुरी, दोनों मिसालें

संपादकीय
05 मई 2017


देश भर के शहरों की स्वच्छता के सर्वे में छत्तीसगढ़ के पास खुश होने को अंबिकापुर, राजनांदगांव, कोरबा और दुर्ग, ये चार म्युनिसिपल हो सकते हैं, लेकिन राजधानी रायपुर की बदहाली जारी है और देश के साफ शहरों में इसका नंबर सवा सौ शहरों के बाद लगता है, और इस शहर के अधिकतर हिस्से को देखने वालों को इस बात की भी हैरानी होती है कि इसका नंबर 129वां भी कैसे आ गया? शहर की गंदगी का हाल यह है कि मानो सफाई का काम म्युनिसिपल की बुनियादी जिम्मेदारी है ही नहीं, और राजधानी का म्युनिसिपल सैकड़ों करोड़ के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने वाली एक कंस्ट्रक्शन कंपनी भर है।
छत्तीसगढ़ के रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों को यहीं के एक किनारे पर बसे हुए अंबिकापुर से सबक लेने की जरूरत है जहां पर एक उत्साही कलेक्टर ने म्युनिसिपल को साथ जोड़कर न सिर्फ शहर को साफ कर दिखाया, बल्कि कचरे की अलग-अलग किस्मों को अलग-अलग करने का एक बड़ा काम भी किया है, और इससे बाकी प्रदेश को जो सीखना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। एक बरस पहले मुख्यमंत्री ग्राम सुराज के दौरान जब सरगुजा पहुंचे थे, तो वहां अंबिकापुर में उन्होंने बदली हुई तस्वीर देखी थी। महिला जनसंगठनों को साथ लेकर प्रशासन और म्युनिसिपल ने पूरे शहर से कचरा उठाने से लेकर उस कचरे के निपटारे तक का काम बड़े अच्छे तरीके से किया था, और राज्य शासन के तमाम बड़े लोगों ने उसे देखा भी था। लेकिन वाहवाही के बाद वहां से बाकी किसी शहर ने कुछ नहीं सीखा। खासकर राजधानी के म्युनिसिपल का हाल सबसे ही निराशाजनक है, जहां पर राज्य बनने के बाद से अब तक निगम सीमा में ही हजारों करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं, लेकिन म्युनिसिपल अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी, सफाई को ही नहीं कर पाया।
दरअसल शहरों को साफ रखना एक ऐसा काम है जिसे जनता को साथ जोड़े बिना सिर्फ अफसर या निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधि अपने दम पर कभी नहीं कर सकते। और आज रायपुर में हाल यह देखने मिलता है कि सत्ता और जनता, ये दो बिल्कुल अलग-अलग तबके हैं, और इन दोनों का आपस में कोई संबंध, कोई लेन-देन, सफाई के मामले में नहीं रह गया। शहर गंदा है, यह तो शहर का हर हिस्सा चीख-चीखकर बता ही देता है, लेकिन एक दूसरा बड़ा खतरा बारूद के ढेर की तरह खड़ा हो रहा है कि शहर के ठोस कचरे का अलग-अलग निपटारा नहीं किया जा रहा, और जो कचरा सड़कर धरती से मिल सकता है, उसका बायो-इस्तेमाल नहीं हो रहा, और बाकी तरह के कचरे को अलग-अलग नहीं किया जा रहा। शहर में जब तक लोगों के बीच ऐसी सभ्यता फैलाई नहीं जाएगी, तब तक म्युनिसिपल चाहे जितना खर्च कर ले, न तो कचरे का कोई इस्तेमाल होगा, न कचरा कम होगा, न सफाई बढ़ेगी। दूसरी तरफ रायपुर सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में भी बार-बार आता है, और उसकी एक वजह शहरी कचरा भी है जिस पर काबू किए बिना शहर का पर्यावरण नहीं सुधरेगा। कचरे के अलावा भी म्युनिसिपल की कई तरह की जिम्मेदारियां हैं, लेकिन वे भी तिरस्कृत पड़ी रहती हैं, और नेता-अफसर जलसों में मगन रहते हैं।
आज दिक्कत यह है कि स्थानीय निर्वाचित संस्थाएं हों, या कि विकास प्राधिकरण जैसी बनाई गई और मनोनीत लोगों की संस्था हो, इन सबको बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाकर घोषित और अघोषित कमाई से बड़ी प्राथमिकता और कुछ नहीं दिखती है।  यह सिलसिला बदलने के लिए ऐसे अफसरों की जरूरत है जिन्हें अपने ओहदों पर गुरूर न हों, और जो एक चुनौती मानकर शहर को सुधार सकें। हम एक बार फिर अंबिकापुर की मिसाल देना चाहेंगे जहां पर सीमित साधनों में भी अफसरों ने यह कर दिखाया है, और दूसरी तरफ रायपुर-बिलासपुर जैसी जगहों पर पिछले बहुत बरसों से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में शहरों को फंसाकर रख दिया गया है, और साफ-सफाई का कोई ठिकाना नहीं है। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को म्युनिसिपलों में अफसरों की तैनाती के वक्त यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका मिजाज कैसा है, क्या वे गली-गली घूमकर काम करवाने में भरोसा रखते हैं, या फिर वे ओहदे को शान समझकर बैठे रहते हैं। मेहनत में ईमानदार, और कल्पनाशील अफसरों की कमी नहीं है, और राज्य शासन को छांटकर ऐसे अफसरों को म्युनिसिपलों में रखना होगा, क्योंकि शहरों की सफाई और उन्हें सुधारने, उनका रख-रखाव करने का जिम्मा एक अलग तरह का है। स्थानीय शासन विभाग से परे, पर्यावरण विभाग को भी इसमें दखल देनी चाहिए, क्योंकि शहरों का पर्यावरण म्युनिसिपल के काम से सीधा प्रभावित होता है। 

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