बिना सिर ढांके जर्मन चांसलर मार्केल पहुंचीं सउदी अरब...

संपादकीय
01 मई 2017


जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल अभी दुनिया के सबसे कट्टर, और मुस्लिम-विरोधी इस्लामी देश सउदी अरब पहुंचीं तो उन्होंने अपना सिर नहीं ढांका। इसके पहले पश्चिमी देशों से भी जो शासन प्रमुख या राष्ट्र प्रमुख महिलाएं, मंत्री, वहां पर जाती रही हैं, उनमें से अधिकतर स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों के मुताबिक अपना सिर ढांक लेती थीं। लेकिन जर्मनी में पिछले दिनों मार्केल ने बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया था, और उसके बाद अब वहां पहुंचने पर उन्होंने पोशाक की अपनी आजादी का इस्तेमाल करते हुए सउदी अरब को एक संदेश भी दे दिया। कहने और करने के बीच यह ईमानदारी और यह हौसला आज की दुनिया में जरूरी इसलिए है कि जगह-जगह कट्टरपंथी लोग अपने धर्म के नाम पर दूसरों की आजादी को खत्म करने पर उतारू रहते हैं।
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ ही दिन हुए जब एक पर्यटक या मॉडल युवती ताजमहल पहुंची, और उसने धूप से बचने के लिए रामनामी दुपट्टा लपेट रखा था, और वहां मौजूद हिन्दू संगठनों के लोगों ने उससे वह दुपट्टा उतरवाया, तब ताजमहल में जाने दिया। आज दुनिया भर में पोशाक को एक तरफ तो व्यक्तिगत आजादी मानकर अपनी पसंद इस्तेमाल करने का दावा किया जा रहा है, दूसरी तरफ बुर्के जैसे पुराने रिवाज के खिलाफ पश्चिमी देशों में जगह-जगह कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को भी उससे आजादी दिलाई जा रही है, या कि उनकी पसंद की आजादी छीनी जा रही है। यह इन दोनों में से क्या है, यह सोचने के नजरिए पर निर्भर करता है। कोई इसे मुस्लिम महिला की आजादी को बढ़ावा देना कह सकते हैं, तो कोई इसे मुस्लिम महिला की आजादी को छीनना भी कह सकते हैं।
दरअसल धर्म और लोकतंत्र इन दोनों के बीच हमेशा ही हर दूरी तक तालमेल बैठ नहीं सकता। जो लोग धर्म को लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं, उन लोगों का आतंक न सिर्फ इस्लामी देशों में देखने मिलता है, बल्कि अब तो हिन्दुस्तान में भी गाय के नाम पर, पहरावे और खानपान के नाम पर, रीति-रिवाज के नाम पर भारत में भी जगह-जगह देखने मिलता है। और हमारा यह मानना है चाहे भारत में तीन तलाक के खिलाफ पहल हो, चाहे वह पश्चिमी देशों में बुर्के के खिलाफ रोक हो, इससे अगर मुस्लिम महिला या किसी और धर्म के मानने वाले लोगों को अलोकतांत्रिक प्रतिबंधों से आजादी मिलती है, तो उसे बढ़ावा देना चाहिए। आज योरप के देशों में बुर्के पर रोक से एक बदलाव आ रहा है, चाहे वह थोपकर क्यों न लाया जा रहा हो। हम किसी धर्म की ऐसी आजादी को सही नहीं मानते जिसमें औरत और मर्द के बुनियादी हकों में इतना बड़ा फर्क किया जाता हो, और छोटी-छोटी बच्चियों को भी बुर्के से लाद दिया जाता हो। यह बात जाहिर है कि पोशाक की ऐसी रोक से मुस्लिम महिलाओं के आगे बढऩे की संभावनाएं कम होती हैं, और उसका नुकसान उनके परिवारों के बच्चों को भी होता है। इसलिए कई बार धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देते हुए भी आज के जमाने, लोकतंत्र, और इंसाफ, इन सबको देखते हुए दुनिया के ताकतवर देशों को, उनके भीतर के ताकतवर नेताओं को पहल करनी ही चाहिए। जिस तरह कुछ महिला राष्ट्र प्रमुख और शासन प्रमुख सउदी अरब जैसे देशों में अपनी पोशाक से यह साफ कर रही हैं कि वे अपनी पोशाक की आजादी छोडऩे वाली नहीं हैं, वह एक हौसलामंद कदम है, और इसे आगे बढ़ाना चाहिए। 

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