भारत में केन्द्र और राज्य स्तर पर नई संवैधानिक जांच एजेंसी बनें

संपादकीय
10 मई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां की संघीय जांच एजेंसी, एफबीआई के डायरेक्टर को बर्खास्त कर दिया है। इसे लेकर अमरीका में भारी बहस शुरू हो गई है क्योंकि इसी डायरेक्टर की निगरानी में अमरीकी चुनाव के दौरान ट्रंप के सहयोगियों और रूस की सरकार के बीच के ऐसे तालमेल की जांच चल रही है जो कि राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने वाली कही जा रही है। वहां पर यह संवैधानिक मुद्दा उठ खड़ा हुआ है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार, उनकी कंपनियां, उनके सहयोगी जिस तरह की जांच में घिरे हुए हैं, उस जांच के बीच जांच के सबसे बड़े अफसर को इस तरह से बर्खास्त करना राष्ट्रपति के अधिकारों, और राष्ट्रपति पर चल रही जांच के बीच सीधे-सीधे टकराव का मामला है। अमरीकी मीडिया कल से इस मुद्दे पर उबला हुआ है, और यह मामला अमरीकी से परे भी हितों के टकराव का ऐसा सवाल खड़ा करता है जिसे दुनिया के बाकी हिस्सों में भी सोचा-विचारा जा सकता है।
भारत में राजनीतिक ताकतों से जुड़े मामलों की जांच उन्हीं नेताओं के मातहत काम करने वाली एजेंसियां करती हैं जिनके अफसरों का भविष्य इन्हीं नेताओं के हाथ रहता है। नतीजा यह होता है कि सत्ता के काबू से परे की कोई जांच एजेंसी रहती नहीं है, और इसमें काम कर रहे लोग सीधे-सीधे सरकार के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और अपने आगे के सरकारी करियर के लिए सरकार चला रहे नेताओं का मुंह तकते हैं। ऐसे में देश में लोकपाल या लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्थाओं का मुद्दा उठता है कि सरकार से परे की ऐसी जांच एजेंसियों को कमजोर बनाकर क्यों रखा जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की सारी दलीलों को खारिज करते हुए यह हुक्म दिया है कि लोकपाल के मौजूदा कानून के तहत ही तुरंत लोकपाल की नियुक्ति की जाए। मोदी सरकार के तीन बरस पूरे होने को आ रहे हैं, और अब तक लोकपाल न बनाने के लिए लोकपाल-कानून में ही फेरबदल की चर्चा जारी है। इसी देर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अभी साफ-साफ आदेश दिया है।
केन्द्र से परे राज्यों में भी भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां सरकार के मातहत काम करती हैं, और इसे लेकर उन पर गंभीर आरोप भी लगते हैं। हमारा ख्याल है कि राजनीतिक जीवन में पारदर्शिता और शुचिता के लिए यह जरूरी है कि जिस तरह लोकसेवा आयोग के संवैधानिक पद पर नियुक्ति के बाद लोग किसी भी तरह का सरकारी पद नहीं ले सकते, उसी तरह की एक जांच एजेंसी होनी चाहिए, जिसमें जाने के बाद लोग सरकार में न लौट सकें, न ही कोई सरकारी मनोनयन पा सकें। भारत के संघीय ढांचे में यह भी जरूरी है कि राज्यों के भीतर भी ऐसी नियुक्तियां राज्य के अफसरों से परे, देश के दूसरे हिस्सों से आए हुए जांच अफसरों में से हो, ताकि वे स्थानीय शासन के प्रभाव और दबाव से मुक्त रहें। यह बात सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं सुहाएगी, लेकिन अगर भारत में जांच और मुकदमों को सत्ता के दबाव से परे रखना है, तो देश में एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था बनानी जरूरी है जैसी कि चुनाव आयोग, या लोकसेवा आयोग की है, जहां पर पहुंचने के बाद लोगों का सरकार से उपकार लेने-देने का सिलसिला खत्म हो जाए। फिर दूसरी बात यह कि ऐसी तमाम नियुक्तियां अपने राज्य से परे ही होनी चाहिए, और इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे अफसरों का एक पूल बनाया जा सकता है, और राज्यों को अफसरों का बंटवारा किया जा सकता है।
आज भारत में जांच और मुकदमे पर किसी को कोई भरोसा नहीं रहता है, जो लोग सत्ता पर बैठे हैं, वे किसी भी किस्म की कार्रवाई से बहुत दूर तक बचते चलते हैं, और उनको सजा मिलने की गुंजाइश लगातार कमजोर की जाती है। भारत के संविधान विशेषज्ञों को एक ऐसी नई व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जो कि केन्द्र और राज्य सरकार के असर से परे की हो, और जिसमें देश भर के अधिकारियों और कर्मचारियों को लाकर सत्ता के भ्रष्टाचार और सत्ता के जुर्म की जांच में ईमानदारी की संभावना पैदा की जा सके। यह एक बिल्कुल नई और मौलिक सोच होगी, लेकिन यह बहुत मुश्किल बात भी नहीं है।

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