कश्मीर के हालात खतरनाक, पर टापू जैसा जीतना असंभव

संपादकीय
11 मई 2017


कश्मीर में कल जिस तरह वहां के एक नौजवान की प्रताडऩा के बाद की लाश सामने आई है, वह दिल दहलाने वाली बात है। बाईस बरस का यह कश्मीरी फौज में भर्ती हुआ था, और पहली बार अपने गांव गया था, जहां आतंकियों ने उसका अपहरण किया, और फिर बहुत बुरी यातना के बाद उसकी लाश को फेंक दिया। पहले से तनाव में चल रहे, बहुत बुरी तरह हिंसा और अलगाव झेल रहे कश्मीर में यह मौत तनाव को किस तरफ मोड़ेगी यह तो साफ नहीं है लेकिन इसने वहां के लोगों को भी हिलाकर रख दिया है।
कश्मीर में जनता का एक हिस्सा अलगाववादियों के साथ है, और उन्हें बाकी हिन्दुस्तान के लोग चाहे राष्ट्रविरोधी कहें, वे अपनी जगह इस तर्कसंगत बात को दोहराते हैं कि जब कश्मीर का भारत में विलय हुआ था, तब यह साफ था कि वहां की जनता जनमत संग्रह करेगी और भारत या पाकिस्तान में रहने की अपनी पसंद से अपना भविष्य तय करेगी। लेकिन जनमत संग्रह के साथ कुछ और शर्तें भी जुड़ी हुई थीं, जिनमें पाक कब्जे वाले कश्मीर से फौजों का हटना भी था, और वह शर्त पूरी न होने की बात कहते हुए भारत ने जनमत संग्रह की संभावना को खारिज ही कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि अब धीरे-धीरे भारत जनमत संग्रह का कोई भविष्य नहीं देखता और वह कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग मानते हुए ही आगे किसी बातचीत के लिए तैयार होता है, चाहे वह पाकिस्तान से हो, चाहे वह कश्मीर के अलगाववादियों से हो।
कश्मीर में लगातार फौज की मौजूदगी से हालात ऐसे बने हैं कि फौज पर तरह-तरह की हिंसा के आरोप लगते हैं, और जब वहां के स्थानीय नौजवान पुलिस और सेना पर, केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर पथराव करते हैं, तो जवाबी पुलिस कार्रवाई की वजह से कश्मीरियों को आए जख्म हालात को और बिगाड़ते हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है, और अदालतों को यह समझ नहीं आ रहा है कि जब तक पथराव चलते रहेगा, तब तक कैसे सुरक्षा बलों से यह कहा जाए कि वे छर्रे वाली बंदूकें इस्तेमाल न करें। दूसरी तरफ कश्मीर के मुद्दे को, उसकी जटिलता को, समझने वाले लोगों का यह कहना है कि कश्मीर की समस्या को एक टापू की तरह नहीं सुलझाया जा सकता, और बाकी देश में जब लगातार माहौल मुस्लिमों के खिलाफ बना रहे, जब देश में जगह-जगह कश्मीरियों पर कुछ हमले भी हों, तब कश्मीरी नौजवानों की नाराजगी को खत्म कर पाना आसान नहीं है। यह एक और बात है कि बार-बार ऐसे सुबूत सामने आते हैं कि पत्थरबाजों को अलगाववादी ताकतें, या कि आतंकी ताकतें, भाड़े पर लेती हैं, और पथराव करना सैकड़ों नौजवानों का पेशा सा हो गया है, तो यह समझ पड़ता है कि कश्मीर में राजनीतिक पहल की जरूरत है, और महज बंदूकों से बात बनने वाली नहीं है। बंदूकें तो कश्मीर में आधी सदी से तैनात हैं लेकिन बात किसी किनारे पहुंच नहीं रही है।
कश्मीर में आज राज्य सरकार भाजपा के साथ गठबंधन वाली है, यह पहला मौका है जब भाजपा जम्मू-कश्मीर सरकार में सत्ता में भागीदार है, और यह भी एक अनोखा मौका है कि वह केन्द्र सरकार में भी इसी वक्त गठबंधन की मुखिया है, और सरकार पर उसका लगभग एकाधिकार है। जहां तक कश्मीर का सवाल है, तो राज्य के भीतर तो भाजपा ने दशकों से चले आ रहे अपने खुद के सभी विवादास्पद मुद्दों को ताक पर धर दिया है, और गठबंधन में छोटे भागीदार की तरह काम कर रही है। लेकिन ऐसा लगता है कि इतना काफी नहीं है, और कश्मीर के हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बाकी देश के हालात सुधारने की जरूरत है, क्योंकि आज अगर देश में यह माहौल बन रहा है कि हिन्दुओं के भीतर ही एक अल्पसंख्यक तबके के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों के मुताबिक देश की बाकी पूरी आबादी को रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो इस तरह का साम्प्रदायिक तनाव बाकी देश के साथ-साथ कश्मीर को भी प्रभावित कर रहा है, और मोदी सरकार, भाजपा, इनकी जैसी साख की जरूरत कश्मीर में है, वैसी साख बन नहीं रही है। बाकी देश में अलग दिक्कत चल रही है, लेकिन खास कश्मीर के सिलसिले में यह कहना जरूरी है कि उसे एक टापू की तरह नहीं जीता जा सकता, बाकी देश के साथ मिलाकर ही देखना होगा।

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