ईवीएम पर आयोग की चुनौती बरसों देर से सामने आई...

संपादकीय
12 मई 2017


चुनाव आयोग ने आज राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर यह चुनौती दी है कि वे ईवीएम के साथ छेडख़ानी करके दिखाएं। पिछले दिनों पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में निराश और हक्का-बक्का आम आदमी पार्टी ने सबसे जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया था, और बाद में उत्तरप्रदेश चुनाव में मटियामेट हो गईं मायावती ने भी यही राग अलापा था कि उन्हें ईवीएम ने हराया है। अब उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि जो भाजपा उत्तरप्रदेश में सपा की सरकार रहते हुए इतने बड़े पैमाने पर ईवीएम धांधली कर सकती थी, तो उसने पंजाब को अपने हाथ से क्यों जाने दिया, और गोवा-मणिपुर में कुछ सीटों से अपना बहुमत क्यों खोया? उत्तरप्रदेश में तो चुनाव करवाने वाले कर्मचारी-अधिकारी लंबे समय से सपा सरकार के तहत काम कर रहे थे, लेकिन पंजाब और गोवा में तो सरकार में भाजपा थी, और कर्मचारी उसके मातहत थे जहां ईवीएम के साथ अगर कोई छेडख़ानी हो सकती थी, तो वह भाजपा के लिए आसान थी। इसलिए ईवीएम की हैकिंग अगर तकनीकी रूप से संभव भी है, तो भी अपनी वजहों से हार को मशीन पर थोपना राजनीतिक दलों के लिए आत्मघाती था, क्योंकि इससे वे खुद ही अंधेरे में जीते हैं।
चुनाव आयोग ने आज यह काम सही किया है कि राजनीतिक दलों को ईवीएम-हैकिंग की चुनौती दी है। दुनिया में बड़ी से बड़ी कंपनियों के फोन-कम्प्यूटर हैक हो जाते हैं, और इसके लिए ये कंपनियां खुद भी हैकर्स को तनख्वाह पर रखती हैं, और बाहर के लोगों को हैकिंग करके दिखाने पर ईनाम भी देती हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी रहता है कि ऐसी कमजोरियां सामने आने पर कंपनियां अपनी मशीनों को, या कि उनके सॉफ्टवेयर को मजबूत बना पाती हैं। भारत का चुनाव आयोग दुनिया के कई देशों में चुनाव करवाने में प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद करता है, और भारतीय चुनाव आयोग की साख बड़ी ऊंची मानी जाती है। ऐसे में अपनी मशीनों को लेकर उसके मन में यह भरोसा रहना चाहिए था कि उन्हें कोई हैक नहीं कर सकते। विपक्ष में रहने वाले दल बरसों से ईवीएम पर शक जाहिर करते आए हैं, और आज भाजपा के एक सांसद ने तो ईवीएम के खिलाफ कुछ बरस पहले एक पूरी किताब ही लिखी थी जो कि बाजार में भी है। आज भाजपा के विरोधी शक जाहिर कर रहे हैं, और ऐसे में चुनाव आयोग को बहुत पहले से यह चुनौती पार्टियों के सामने रख देनी थी। कई बार मुजरिमों से भी पुलिस को सीखने मिलता है, नकली चाबी से ताले खोलने वालों के तजुर्बे से ताला बनाने वाली कंपनियां बहुत कुछ सीख पाती हैं।
इस पूरे सिलसिले में एक ही बात हमारी समझ में नहीं आई है कि भारत जैसे आईटी-दिमागों से संपन्न इस देश में चुनाव आयोग ने पहले ही अपनी मशीनों को राजनीतिक दलों और जानकारों के सामने क्यों नहीं रख दिया था? ऐसा करके या तो आयोग की मशीनों की कमजोरी और खामी सामने आती, या फिर जनता के बीच गलतफहमी फैलाने की राजनीतिक कोशिशें थमतीं। आयोग की यह पहल बहुत देर से आई है, और देश की साखदार संस्थाओं को जनता के बीच भरोसा बनाए रखने के लिए समय रहते काम करना चाहिए। जब अपने आपको चुनाव विशेषज्ञ कहने वाले एक व्यक्ति ने ईवीएम की अविश्वसनीयता पर पूरी किताब लिख मारी थी, तभी अगर उसके दावे चुनाव आयोग झूठे साबित कर देता, तो आज वह आदमी भाजपा का सांसद नहीं बना होता। ईवीएम पर शक और तोहमत लगाकर, उस सीढ़ी पर चढ़कर एक शक्की तो संसद पहुंच गया, और चुनाव आयोग उसके बाद भी बरसों बैठे रहा। लोकतंत्र में जनधारणा का ख्याल रखना भी जरूरी रहता है, और हम उम्मीद करते हैं कि चुनाव आयोग की चुनौती से जो भी साबित हो, किसी न किसी की साख जरूर बढ़ेगी, ईवीएम और चुनाव आयोग की बढ़ेगी, या मशीनों को अविश्वसनीय बताने वाले नेताओं की बढ़ेगी। लोकतंत्र और जनता इन दोनों ही हालात में जीतेंगे।

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