उत्साही समाजसेवियों को सरकारी बढ़ावा भी मिले

संपादकीय
13 मई 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज मुख्यमंत्री ने एम्स के पास मरीजों के रिश्तेदारों के ठहरने के लिए बनाई जा रही एक धर्मशाला का भूमिपूजन किया है। इसे एक निजी ट्रस्ट बना रहा है, और यह ट्रस्ट पहले से प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, रायपुर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के पास बरसों से यह काम कर रहा है। बहुत ही रियायती दाम पर गरीब मरीजों के साथ आए लोगों के रहने और खाने-पीने का एक बहुत अच्छा और साफ-सुथरा इंतजाम संभव हो सकता है, यह इन बरसों में देखने मिला है, और इसके साबित होने के बाद राज्य सरकार ने वहीं पर बनी एक दूसरी सरकारी धर्मशाला भी इसी ट्रस्ट को चलाने के लिए दे दी है। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि मेकाहारा के पास की यह पहली धर्मशाला भी सब्जी बेचकर कमाने वाली बिन्नी बाई नाम की एक महिला ने अपने लाखों रूपए देकर बनवाई थी, और अब यह दूसरा ट्रस्ट अपनी बनाई धर्मशाला के साथ इसे भी चला रहा है।
ऐसी कुछ मिसालें यह साबित करती हैं कि अगर समाज में उत्साही लोग रहें, और उनकी साख की विश्वसनीयता रहे, तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके लिए अपने पैसे भी खर्च करने होते हैं, और दूसरे लोग भी साथ जुट जाते हैं। और यह बात कोई अकेले छत्तीसगढ़ में ही नहीं है, देश भर में जगह-जगह समाजसेवा की ऐसी मिसालें सामने आती हैं, और बहुत से लोग दूसरों को देखकर, उनसे सीखकर भी ऐसा काम करते हैं। इस बात की तारीफ में हम इसलिए लिख रहे हैं कि पूरे प्रदेश में जहां-जहां अस्पताल हैं, वहां-वहां मरीजों के साथ आकर सैकड़ों लोगों को रहना पड़ता है, और उनके लिए कोई इंतजाम नहीं हो पाता। गरीब रिश्तेदार तो अस्पताल के बरामदों में या किसी पेड़ के नीचे भी सो जाते हैं, लेकिन उनके नहाने-खाने का कोई इंतजाम नहीं रहता। उनकी इतनी क्षमता भी नहीं रहती कि वे खर्च करके यह काम कर सके। इसलिए अगर कोई ट्रस्ट ऐसा काम कर रहा है, तो उससे दूसरे शहरों के दूसरे लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए, और सरकार को भी उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।
रायपुर में ही एक दूसरी ऐसी मिसाल एक चिकित्सा जांच केन्द्र की है जिसे एक व्यापारी परिवार ने अपने पैसों से बनवाया है, और वहां पर रोजाना सैकड़ों लोगों की रियायती जांच होती है। वैसे तो सरकार को यह सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए, लेकिन भारत में सरकारी ढांचा जितने भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार रहता है, उसके चलते सरकार ऐसी इमारत चाहे बना दे, उसे सरकारी कर्मचारियों के भरोसे चलाया नहीं जा सकता। इसके लिए बहुत ही समर्पित समाजसेवी रहना जरूरी है, और जहां-जहां ऐसे लोग सामने आते हैं, सरकार को जमीन से लेकर दूसरे किस्म के अनुदान तक का इंतजाम करना चाहिए, ताकि गरीबों की सेवा हो सके, उन्हें सहूलियत मिल सके। इससे परे भी बहुत से ऐसे दायरे हैं जिनमें समाज की सबसे जरूरतमंद लोगों के लिए बाकी सक्षम समाज कुछ कर सकता है, और इसी छत्तीसगढ़ में बढ़ते कदम नाम की एक संस्था ने मृत्युकर्म से जुड़े हुए बहुत से कामों के लिए अपनी मुफ्त की सेवा देना शुरू किया, और उसे लगातार बढ़ाया है। दूसरी तरफ इसी संस्था ने रक्तदान-नेत्रदान से लेकर शरीरदान तक की प्रेरणा देने, और करवाने का रिकॉर्ड भी बनाया है। इसी तरह कुछ संस्थाएं स्कूली बच्चों की पुरानी किताबों को इकट्ठा करके उन्हें दूसरे जरूरतमंद बच्चों को देने का काम कर रही हैं। समाज और सरकार को ऐसी कोशिशों का हौसला बढ़ाना चाहिए।

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