हरियाणा में बढ़ते सेक्स-जुर्म के पीछे बकवासी नेता जिम्मेदार

संपादकीय
15 मई 2017


हरियाणा में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार, दलितों से बलात्कार, और स्कूल-कॉलेज की लड़कियों से छेडख़ानी की खबरें भयानक रफ्तार से आ रही हैं, और भाजपा सरकार के राज में वहां के हाल पिछली कांग्रेस सरकार के हाल से बहुत अधिक खराब दिख रहे हैं। वैसे तो बलात्कार और सेक्स-अपराध हर बार रोके जाने लायक जुर्म नहीं रहते हैं, क्योंकि इनके हो जाने के बाद ही आमतौर पर पुलिस तक बात पहुंचती है, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि महिलाओं पर होने वाले जुर्म और जुल्म को लेकर सरकार का जो रूख रहता है, उससे भी ऐसे जुर्म के खतरे कम या ज्यादा होना तय होता है। हरियाणा के साथ यह बुरी नौबत पहले दिन से जुड़ी हुई है जब मनोहर लाल खट्टर ने वहां का राज सम्हाला। लोगों को अच्छी तरह याद है, और गूगल पल भर में सैकड़ों नतीजे पेश कर देता है कि किस तरह चुनाव के पहले ही खट्टर ने महिलाओं के बारे में बहुत ही अश्लील, भद्दी, और हिंसक बातें कही थीं। बलात्कार को लेकर खट्टर ने कहा था कि जिन औरतों को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं चली जातीं।
अब हरियाणा एक तो पहले से ही महिलाओं के साथ बेइंसाफी वाले प्रदेश के रूप में जाना जाता, और इसका सबसे बड़ा सुबूत वहां आबादी के अनुपात में है, पूरे देश में लड़कियों का सबसे कम अनुपात इसी एक शहर में है। दूसरी तरफ यहां की खाप पंचायतें लगातार लड़कियों और महिलाओं पर तरह-तरह की रोक लगाती आई हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा, इनका कभी यह हौसला नहीं रहा कि वे खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह भी खोल सकें। नतीजा यह रहा कि जब दंगल जैसी फिल्म के रास्ते हरियाणा की कुछ बहादुर लड़कियां सामने आईं, और इसके पहले उन्होंने ओलंपिक में जाकर हिन्दुस्तान का सिर ऊंचा किया, तो फिर हरियाणा में लड़कियों के हक की चर्चा की सुगबुगाहट शुरू हुई। लेकिन आज भाजपा के राज में हरियाणा का हाल यह है कि वहां स्कूल की बच्चियां स्कूल की पोशाक में अनशन पर बैठी हैं कि उन्हें आते-जाते रास्ते में छेड़ा जाता है। छेडऩे वालों का यह हौसला, और उनकी यह सोच वहां की खाप पंचायतों और वहां के मुख्यमंत्री के मर्दाना बयानों से बढ़ती हैं। दिक्कत यह है कि खट्टर के ऐसे किसी भी बयान पर उनकी पार्टी की कोई नाराजगी सामने नहीं आई, और इससे हरियाणा के लोगों को ऐसा लगा कि लड़कियां और महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं, और उन पर कभी भी हाथ डाला जा सकता है।
हमने उत्तरप्रदेश में समाजवादी नेता आजम खान के अश्लील बयानों को लेकर भी कहा था कि बलात्कार की शिकार लड़की के खिलाफ ऐसा बयान देने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। बाद में कुछ लोगों के अदालत पहुंचने पर अदालत ने आजम खान की बांह मरोड़ी थी, और उनसे बिना शर्त माफी मंगवाई थी। हमारा यह मानना है कि पूरे देश में जहां-जहां किसी भी पार्टी के नेता, या कोई और सार्वजनिक व्यक्ति, जब कभी कोई हिंसक महिला-विरोधी बयान दें, तो उसके खिलाफ महिला आयोगों को, मानवाधिकार आयोगों को तुरंत नोटिस लेना चाहिए, और उन्हें नोटिस देना चाहिए। जब तक बकवासी नेता सजा नहीं पाएंगे, तब तक वे समाज में सेक्स-अपराधियों का हौसला बढ़ाने का काम ही करते रहेंगे। यह सिलसिला चारों तरफ की कोशिशों से रोकने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि किसी भी चुनाव के वक्त किसी भी पार्टी या नेता के ऐसे बयानों की रिकॉर्डिंग या कतरनों को लेकर जनता को जागरूक करना चाहिए कि क्या वे ऐसे लोगों को वोट देना चाहेंगे? अगर ऐसी मुहिम चलने लगी, तो नेताओं की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। दिक्कत यह है कि राजनीतिक दलों में से अधिकतर में ऐसे नेता भरे हुए हैं, और इसलिए इस तरह के मुद्दों को कोई पार्टी उठाती नहीं है। चुनाव के वक्त मतदाता-जागरूकता के लिए गैरराजनीतिक संगठनों को अभियान चलाना चाहिए। आज भी कुछ संगठन नेताओं और पार्टियों के खर्च, उनके अपराध को लेकर रिपोर्ट जारी करते हैं। कुछ दूसरे संगठनों को यह जिम्मा लेना चाहिए कि बकवास करने वाले नेताओं की कतरनों को चुनाव के वक्त जनता के सामने रखे, और जनमत को प्रभावित करे।

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