मोहब्बत का दुश्मन बना हुआ यह देश

संपादकीय
17 मई 2017


अभी जब यह अखबार तैयार हो रहा है छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक नौजवान ने एक युवती की कटार भोंककर हत्या की कोशिश की, और खुद एक टॉवर पर चढ़कर कूदकर जान दे दी। पिछले ही हफ्ते इसी राज्य के महासमुंद में दो नौजवानों ने एक साथ फांसी लगा ली, और उनके बारे में बाद में बताया गया कि उन दोनों की प्रेमिकाओं की किसी और से शादियां हो गईं, और इसी गम में उन्होंने जान दे दी। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब प्रेम को लेकर कोई आत्महत्या न होती हो, यह एक अलग बात है कि नफरत को लेकर आत्महत्या करने की बात भी सुनाई नहीं देती है कि कोई व्यक्ति किसी विचारधारा या किसी नेता से नफरत करते हुए आत्महत्या कर ले।
भारत में लगातार प्रेम के खिलाफ एक नफरत का माहौल बढ़ते चल रहा है। दरअसल लोगों की जितनी दिक्कत किसी के प्रेम से है, उससे कहीं अधिक दिक्कत इससे है कि वह प्रेम किसी ऐसे न हो जाए जो कि किसी दूसरी जाति का हो, या कि किसी दूसरे धर्म का हो। बहुत से लोगों की दिक्कत यह भी रहती है कि अपने अमीर घर के लड़के या लड़की को किसी गरीब से मोहब्बत न हो जाए। ऐसे में धर्म और जाति व्यवस्था, आर्थिक असमानता, ये सब तो नौजवान मोहब्बत पर टूट ही पड़ते हैं, इनके अलावा भी परिवार के लोगों का भरोसा इस बात से भी टूटता है, और उन्हें इस बात से भी निराशा होती है कि घर के लड़के या लड़की के जीवनसाथी चुनने का मौका उन्हें नहीं मिल रहा। यह पूरा सिलसिला एक पूरी नौजवान पीढ़ी को निराशा में जीने या हताशा में मरने के लिए बेबस करके छोड़ रहा है।
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि दुनिया में वही समाज आगे बढ़ते हैं, वही देश तरक्की करते हैं जहां पर नौजवान पीढ़ी को अपनी हसरतों को पूरा करने का मौका मिलता है। जो लोग प्रेम या सेक्स, या जीवनशैली को लेकर लगातार निराशा में जीते हैं, उनके कामकाज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है, और देश की अर्थव्यवस्था पर भी। ऐसे में समाज के भीतर एक जागरूकता आना तो दूर रहा, लोग तभी अपने काबू को छोड़ पा रहे हैं जब शहरीकरण के चलते गांव छोड़कर लोग शहर आ जाएं, या कि नौजवान बच्चे मां-बाप का घर छोड़कर काम के सिलसिले में किसी दूसरे शहर या किसी दूसरे देश जाकर बस जाएं, तभी मां-बाप या समाज का शिकंजा ढीला पड़ता है।
भारत में समाज में जागरूकता की जरूरत इतनी अधिक है, और उसका कोई जरिया दिख नहीं रहा है, इसलिए रोजाना प्रेम को लेकर कई तरह से हत्या और आत्महत्या की नौबत आ रही है। दूसरी बात यह कि इस पूरे सिलसिले को एक निजी मामला मानकर लोग इसे एक सामाजिक समस्या भी नहीं मान रहे हैं। जबकि प्रेम विवाह से धर्म और जाति के बंधन टूटते हैं, दहेज प्रथा टूटती है, और कई तरह की वे बीमारियां हटती हैं जो कि एक ही रक्त समूह की जात-बिरादरी के भीतर शादियों से बढ़ती हैं। इसलिए देश के लोगों को प्रेम विवाह को बढ़ावा देने के लिए एक जागरूकता लाने की कोशिश करना चाहिए।

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