किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव

संपादकीय
18 मई 2017


हरियाणा के मुख्यमंत्री रहते हुए ओमप्रकाश चौटाला पर शिक्षक भर्ती में बड़े घोटाले का मुकदमा चला, और दो बरस पहले अदालत से उन्हें दस बरस कैद मिली। वह कैद अब तक जारी है इससे यह जाहिर होता है कि उन्हें ऊपर की किसी अदालत से अधिक राहत नहीं मिल पाई। चौटाला परिवार के ऊपर सत्ता की ताकत से अंधाधुंध कमाई के राजनीतिक आरोप भी लगते रहे, और जब किसी को ऐसी सजा मिल जाती है, तो यह जाहिर रहता है कि उनके खिलाफ आरोप संदेहों से परे साबित हो चुके हैं। वरना हिन्दुस्तानी अदालतों से ताकतवर तो आमतौर पर बाहर अपनी कार तक लाल कालीन बिछाकर लौटते हैं, और वहां से जेल महज गरीब और कमजोर ही जाते हैं। लेकिन सत्ता पर बैठकर भ्रष्टाचार पर लिखने को नया कुछ भी नहीं है, चौटाला पर लिखने का मौका एक दूसरी वजह से है कि 82 बरस की उम्र में ओमप्रकाश चौटाला ने जेल के भीतर से बारहवीं की परीक्षा पास की है, और फस्र्ट डिवीजन में पास की है। अब इसके बाद वे कॉलेज की पढ़ाई करना चाहते हैं। परिवार ने बताया कि वे एक पारिवारिक शादी के लिए पैरोल पर घर आए थे, लेकिन परीक्षा देने के लिए फिर जेल लौट गए।
अब यह बात बड़ी दिलचस्प है कि 82 बरस की उम्र में, जब अगले आठ बरस जेल में और रहना है, तब कोई ताकतवर आदमी मेहनत से पढ़े, और इम्तिहान दे। इस बात को हम इस भरोसे के साथ लिख रहे हैं कि जिस भ्रष्टाचार की वजह से चौटाला जेल में है, वैसा कोई भ्रष्टाचार उन्होंने जेल के भीतर इस परीक्षा को पास करने के लिए नहीं किया होगा। अभी तक की खबरें बताती हैं कि उन्होंने मेहनत से पढ़ाई की है, और यह मेहनत, यह लगन, दूसरों के लिए कुछ सीखने की बात भी हो सकती है। एक अरबपति परिवार का एक बुजुर्ग, मुख्यमंत्री रहने के बाद 80 बरस की उम्र में जेल जाए, और वक्त का इस्तेमाल करके पढ़ाई करे, तो इससे जेल के भीतर के बाकी लोग, और जेल के बाहर के आजाद लोगों को भी यह सीखने का मौका मिलता है कि समय का कैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।
आज जेल के बाहर भी हिन्दुस्तान में दसियों करोड़ ऐसे नौजवान हैं जो स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई के बाद निठल्ले बैठे हुए हैं, और उन्हें अपनी नालायकी, या निकम्मेपन को सही ठहराने के लिए कुछ तर्क भी हासिल हैं। अगर वे अनारक्षित तबके के हैं, तो वे आरक्षित तबकों को कोस लेते हैं, अगर वे गरीब हैं, तो उनके पास यह तर्क है कि सरकारी नौकरी तो बिना रिश्वत मिलती नहीं है। लेकिन खाली बैठे हुए लोग अंग्रेजी सीखें, कम्प्यूटर सीखें, तौर-तरीके सीखें, सामान्य ज्ञान बढ़ाएं, तो जीवन में उनकी सभी तरह की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की आबादी के एक बड़े हिस्से में लोगों के मन में चुनौतियों के लिए कोई सम्मान नहीं है, और बच्चे यह उम्मीद करते हैं कि मां-बाप उन्हें पढ़ाएं-लिखाएं, और उसके बाद उनके लिए एक नौकरी भी खरीद दें। और जब तक नौकरी न खरीदी जा सके, तब तक एक मोबाइल और एक मोबाइक जरूर खरीद दें। दूसरी तरफ दुनिया के जो विकसित और संपन्न देश हैं, उनमें खरबपतियों के बच्चे भी अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में जेब खर्च निकालने के लिए कहीं वेटर की तरह काम कर लेते हैं, कहीं कार धो लेते हैं, तो कहीं किसी और किस्म की मजदूरी कर लेते हैं। विकसित सभ्यताओं में उन बच्चों को हिकारत के साथ देखा जाता है जो अपने संपन्न मां-बाप के पैसों पर पलते हुए बिना कोई काम करते हुए कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में मेहनत को हिकारत से देखा जाता है, और यहां के नौजवान यह मानकर चलते हैं कि पढ़-लिख लेने के बाद थोड़े समय के लिए भी मेहनत का कोई काम करना उनका बड़ा अपमान होगा।
लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा, और यह सोचना होगा कि फिजूल गुजारा हुआ वक्त कभी दुबारा नहीं आता। घड़ी के कांटे उल्टे नहीं घूमते, और न ही चलती हुई घड़ी के कांटे थमकर यह इंतजार करते हैं कि उसे बांधे हुए लोग पहले कुछ और कर लें, तब फिर घड़ी आगे बढ़ेगी। लोग अगर यह सोचें कि हर दिन का एक तिहाई वक्त तो सोने में जाता है, बाकी वक्त में कुछ घंटे रोज के जरूरी कामों में जाते हैं। इस तरह किसी के पास भी जिंदगी में आधे से कम वक्त ही कुछ करने के लिए बचता है। इसलिए रोज एक घंटे बर्बाद करने वाले लोग भी रोज के पूरे समय में से दो घंटे बर्बाद कर लेते हैं। यह सोचकर लोगों को वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए, और इसकी संभावनाएं बहुत हैं। बयासी बरस की उम्र में एक अरबपति जेल में रहते हुए मेहनत करके पढ़ रहा है, और अगर बाकी की आठ बरस की कैद पूरी गुजारनी पड़ी, तो हो सकता है कि ओमप्रकाश चौटाला एमए-पीएचडी होकर जेल से निकलें। एक किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव होता है।

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