भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए

संपादकीय
19 मई 2017


आज देश भर में कारोबारियों के बीच महज एक बात की चर्चा है कि नए लागू होने वाले जीएसटी से क्या-क्या फर्क पड़ेगा। बाजार का दोनंबरी हिस्सा इस बात को लेकर भी फिक्र में है कि क्या इससे बिना बिल, बिना टैक्स का धंधा करना मुश्किल हो जाएगा? लेकिन इन सबसे परे एक मजे की बात यह है कि यूपीए सरकार के पूरे दस बरस जीएसटी का पूरी ताकत से विरोध करने वाली एनडीए ने आज सरकार में रहते हुए इसे लागू किया है, और यूपीए ने विपक्ष के अपने हक का इस्तेमाल करते हुए पिछले ढाई बरस इसका विरोध किया, लेकिन अब साथ देकर संसद में जीएसटी बिल पास करा लिया, क्योंकि यह जीएसटी बिल यूपीए का ही बनाया हुआ था।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ सहित भाजपा वाले राज्यों के वित्त और वाणिज्य मंत्रियों ने यूपीए की बुलाई हुई राज्यों की बैठकों में लगातार जीएसटी का जमकर विरोध किया था, और अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद अपने सारे विरोध को वापिस लेकर वित्तमंत्री अरूण जेटली मानो दूसरे पक्ष की तरफ से अदालत में जिरह करने लगे, और जीएसटी पास कराने के लिए पसीना बहाने लगे। लेकिन ऐसा सिर्फ इसी एक मामले को लेकर नहीं हुआ है, यूपीए सरकार का एक और बहुत बड़ा कार्यक्रम था आधार कार्ड का, जिसे एनडीए ने देश के लिए तबाही करने वाला, और गोपनीयता, निजता खत्म करने वाला करार दिया था, और घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर एनडीए की सरकार आधार कार्ड को खत्म कर देगी। लेकिन सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री से आधार कार्ड के जन्मदाता, कांग्रेस में शामिल हो चुके नंदन निलेकेणि ने मुलाकात की, और एक ही मुलाकात में नरेन्द्र मोदी आधार कार्ड पर कुछ ऐसे फिदा हुए कि सुप्रीम कोर्ट की सारी रोक-टोक के खिलाफ जाकर भी हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया, और अब तो भारत में आधार कार्ड को लेकर लतीफे और कॉर्टून बनते हैं कि इसके बिना लोग क्या-क्या नहीं कर सकते।
हम जीएसटी पर चर्चा के लिए आज यहां नहीं लिख रहे, हमारा मकसद राजनीति के इस पहलू पर लिखना था कि बहुत सी बड़ी योजनाओं और बड़ी नीतियों पर भारत की राजनीति में विरोध के लिए विरोध का जो माहौल है, उससे बड़ा नुकसान भी होता है। राजनीतिक दलों के बीच कटुता इतनी हावी हो जाती है कि जनकल्याण के लिए भी सत्ता और विपक्ष के बीच बातचीत नहीं हो पाती। एनडीए सरकार ने कश्मीर में भाजपा की पुरानी सारी कश्मीर-नीति या कश्मीर-रणनीति को किनारे धर दिया है, और अपने सारे सिद्धांतों को छोड़कर वह वहां पर राज्य सरकार में हिस्सेदार हो गई है। हम ऐसी बातों को याद दिलाकर एनडीए या भाजपा को कोई ताना देना नहीं चाहते क्योंकि भारत जैसे संसदीय-चुनावी लोकतंत्र में बहुत से मुद्दे चुनावों के साथ खत्म हो जाते हैं। जो नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव में नवाज शरीफ को मनमोहन सरकार की खिलाई बिरयानी को गिनाते हुए आमसभाओं में यह दावा करते थे कि किस तरह एक हिन्दुस्तानी फौजी के सिर के बदले दस या कितने सिर पाकिस्तानी सैनिकों के लेकर आएंगे, वही नरेन्द्र मोदी खुद होकर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाने पाकिस्तान गए, उनके परिवार के लिए तोहफे लेकर गए, और उनके परिवार से मोदी की मां के लिए आए हुए तोहफों को मंजूर भी किया।
भारतीय राजनीति में थोड़ी सी परिपक्वता बढऩे की जरूरत है। सत्ता और विपक्ष इन दोनों में रहते हुए तर्क और न्याय को छोडऩा नहीं चाहिए। देश के हित में क्या है, और दुनिया के हित में क्या है यह ध्यान में रखकर ही चुनावी राजनीति करनी चाहिए। यह एक अच्छी बात है कि यूपीए के बनाए हुए बहुत से कार्यक्रमों को, बहुत से नीतियों को, एनडीए लागू कर रही है, जारी रखे हुए हैं, और उनके लिए अंधाधुंध बजट भी दे रही है, जैसे कि आधार कार्ड के लिए, या कि मनरेगा की मजदूरी के लिए। भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए, और उसकी वजहें, महज कुछ ही वजहें हमने यहां गिनाई हैं।

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