सोशल मीडिया ने देशप्रेम के झांसे का बहुत बड़ा मौका जुटा दिया है

संपादकीय
02 मई 2017


इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को लेकर कम से कम भारत में जो लोग हमें सोशल मीडिया पर दिख रहे हैं, वे राष्ट्रभक्ति, देशप्रेम के साथ-साथ राष्ट्रवाद से सराबोर हैं, और वे इस अंदाज में फेसबुक या ट्विटर पर नारे लिख रहे हैं कि वे खुद ही जाकर एक हिन्दुस्तानी सैनिक के कटे सिर के बदले पचास पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट लाएंगे। यह सिलसिला कुछ नया नहीं है, और सोशल मीडिया के पहले जब टीवी चैनल सड़क किनारे लोगों को रोककर उनकी प्रतिक्रिया लेते थे, तब भी इसी किस्म की बात कही जाती थी, और दिखाई जाती थी।
अब इसे कुछ समझने की जरूरत है कि लोगों की ऐसी सोच की वजह क्या है, और उससे नफा-नुकसान क्या है। दरअसल इंसानी सोच बहुत किस्म के झांसे को अपने खुद के लिए खड़ी करती है, और अपने शरीर को तकलीफ से बचाकर चलती है। लोग इन दिनों प्रचलन में आ चुके फिटनेस बैंड पहनकर यह समझ लेते हैं कि वे अपनी फिटनेस के लिए चौकन्ने हैं। यह एक किस्म की मनोवैज्ञानिक तसल्ली होती है, जो कि अपने आपके दिमाग को संतुष्ट कर देती है, और चर्बी को तकलीफ नहीं देती। और सदियों से यह भी चले आ रहा है कि लोग पुण्य कमाने के लिए, अपने पाप धोने के लिए, कहीं मछली को आटे की गोलियां डालते हैं, कहीं बंदर को चना खिलाते हैं, कहीं पंछी के लिए पानी के कटोरे रखते हैं, कहीं गाय ढूंढकर उसे एक रोटी दे देते हैं, और सबसे लोकप्रिय झांसा है जाकर ईश्वर को थोड़ा सा चढ़ावा चढ़ाना, और फिर उससे बड़ी सी उम्मीद कर लेना।
ऐसी हरकतों से भला तो शायद ही किसी का होता हो, सिवाय अपने आपके। यह झांसा तरह-तरह के अपराधबोध से मुक्ति पाने में मदद करता है, और लोगों को लगातार एक आत्मसंतुष्टि और एक गौरव में जीने का मौका देता है। लोग अपने को दानी और समाजसेवी कहने का एक मौका पाते हैं, एक वजह पाते हैं, और बाकी वक्त उसकी चर्चा का रास्ता निकाल लेते हैं। आमतौर पर जो लोग रात-दिन टैक्स चोरी में लगे रहते हैं, जो मिलावट करते हैं, नाप-तौल की चोरी करते हैं, और दूसरे तरह के जुर्म में शामिल रहते हैं, वे लोग जरूर ईश्वर को भी झांसा देने का काम नियमित रूप से करते हैं, वे तरह-तरह की मनौतियां भी मान लेते हैं, और अपनी आत्मा को मानो किसी लॉंड्री में ले जाकर ड्राईक्लीन करवाने के अंदाज में धर्मस्थान जाकर काली कमाई का थोड़ा सा हिस्सा चढ़ाकर आ जाते हैं। लोगों को याद होगा कि इमरजेंसी के वक्त खबरों में आए और जेल गए, देश के एक सबसे बड़े तस्कर हाजी मस्तान को मुंबई शहर में गरीब मरीजों के लिए कुछ एंबुलेंस चलाने के लिए भी जाना जाता था, हालांकि उस दौर में भी उनका मुख्य काम तस्करी था, और समाजसेवा के काम में अपनी कमाई की थोड़ी सी जूठन खर्च करके वे ढेर सी तसल्ली पा जाते रहे होंगे।
देशप्रेम और राष्ट्रवाद कुछ इसी किस्म की बातें हैं, और लोगों को सरहद पर कुर्बानी देने के नारे सुहाते हैं, क्योंकि वे खुद सरहद से बहुत दूर हैं, और फौज में भी नहीं हैं। उनको पाकिस्तान पर हमला करने, जंग छेड़ देने की बात सुहाती है, क्योंकि उनका अपना घर सरहद पर बसा हुआ नहीं है, और वे जंग के धमाकों को घर बैठे टीवी पर देखेंगे, न कि उनकी छत को तोड़ते हुए कोई गोला भीतर पलंग पर गिरेगा। एक दूसरी दिक्कत यह है कि ऐसे लोग अपनी नासमझी में युद्धोन्माद को देशप्रेम मान बैठते हैं, और देशप्रेम की बाकी तमाम जरूरतों को किनारे रख देते हैं। सोशल मीडिया पर भी किसी ने कुछ समय पहले यह लिखा था कि देशप्रेम के लिए सरहद पर जाकर लडऩा ही जरूरी नहीं है, देश के भीतर साफ-सुथरी जगह पर थूकना बंद करके भी देशप्रेम दिखाया जा सकता है, पार्किंग ठीक करके, या कि ट्रैफिक नियमों को मानकर भी देशप्रेम दिखाया जा सकता है। आमतौर पर देशप्रेम और राष्ट्रवाद की बातें करने वाले लोग अपनी जिम्मेदारी सरहद पर शहादत की चर्चा में साबित कर लेते हैं, क्योंकि वहां उनका खुद का सिर दांव पर नहीं लगा है।
इसलिए जिस तरह लोग अपने अपराधबोध से मुक्त होने के लिए कहीं पशु-पक्षियों को झांसा देते हैं, कहीं ईश्वर को झांसा देते हैं, ठीक उसी तरह देश को भी झांसा देते हैं, यह साबित करते हुए कि वे देश की फिक्र में दुबले हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने लोगों को एक नए किस्म का धर्मस्थल दिला दिया है जहां पर वे झांसा देने का काम कुछ और कर सकते हैं, और हो सकता है कि उनके दिमाग का एक हिस्सा उनके ही दिमाग के बाकी हिस्से को अंधेरे में रखते हुए ऐसा झांसा दे रहा हो, और दिमाग के ऊपर का सिर देशप्रेमी होने के गौरव में तना हुआ भी हो।

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