मोदी सरकार के तीन बरस और भाजपा की रीति-नीति

संपादकीय
21 मई 2017


नरेन्द्र मोदी की सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर राजनीतिक और सरकारी दोनों किस्म के मोर्चों पर बहुत तरह के विश्लेषण होने शुरू हो गए हैं, और ये कई दिनों तक चलते रहेंगे। आर्थिक मोर्चे के अधिक जानकार लोग उस बारे में लिखेंगे, और विदेश नीति के जानकार लोग उस बारे में। लेकिन बहुत सी साधारण बातें हैं जिन पर लिखने के लिए एक साधारण समझ काफी होती है, और न्याय की सोच जरूरी होती है। इनमें से एक, राजनीतिक पैमाने पर तौला जाए तो नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्री बनने के पहले से जिस तरह देश के जनमत को झकझोर कर रख दिया था, और एक ऐतिहासिक जीत के  साथ वे भाजपा को सत्ता पर लेकर आए थे, उस पर तो लिखा जा चुका है, लेकिन उस राजनीतिक जीत की जो निरंतरता बनी हुई है, वह हैरान करने वाली है। एक के बाद दूसरा राज्य जीतकर भाजपा ने अपनी ताकत और अपनी जमीनी पकड़ को उसकी अपनी उम्मीद से बहुत अधिक बढ़ा लिया है। और देश के दूसरे राजनीतिक दलों के सामने यह बात न सिर्फ एक मिसाल की तरह खड़ी हो गई है, बल्कि एक ऐसी चुनौती भी बन गई है जिसका कोई मुकाबला 2019 के आम चुनावों में भी लोगों को नहीं दिख रहा है।
हम कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा करना चाहते हैं कि भाजपा की इस बुलंदी की क्या वजहें रही हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की गुजरात के कार्यकाल की जोड़ी दिल्ली में आकर पहली बार काम कर रही है, और उसने दिल्ली सहित पूरे देश के अपने संगठन को कुछ इस तरह मजबूत पकड़ में ले लिया है कि उनसे परे भाजपा में कुछ बचा हुआ दिखता नहीं है। अब कुछ लोगों को यह लग सकता है कि दो लोगों के हाथों में सत्ता का इतना इक_ा हो जाना लोकतांत्रिक नहीं है, लेकिन देश की अधिकतर पार्टियां तो ऐसी हैं जिनमें दो नेता भी नहीं, महज एक ही कुनबे के हाथ में पूरी ताकत है, ऐसे में दो लोगों के हाथों में ताकत को अलोकतांत्रिक कैसे कहा जाए? दूसरी बात यह कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने खुद अविश्वसनीय किस्म की रोजाना की मेहनत लगातार जारी रखी है, और उनकी पार्टी के जिला स्तर के नेताओं का भी यह कहना है कि जिस तरह पार्टी में एक वक्त संघ के प्रचारक आकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता का काम करते थे, आज उसी तरह भाजपा के हर सदस्य से पूर्णकालिक मेहनत करवाई जा रही है, और साल भर पार्टी के कार्यक्रम चल रहे हैं।
तीसरी बात यह कि भाजपा ने इन तीन बरसों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लेकर गोहत्या या नौजवानों के प्रेम जैसे बहुत से भावनात्मक मुद्दों को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाने से कोई परहेज नहीं किया, और पार्टी के कुछ नेता अहिंसक बातें करते रहे, और कुछ दूसरे नेता घोर हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करते हुए ही केन्द्रीय मंत्री, और राज्य के योगी सरीखे मुख्यमंत्री भी बनते रहे। देश की जनता के बीच एक धुंध सी कायम रही, और दोनों तरह के नेताओं की जगह बनाकर भाजपा ने हिन्दुओं के बीच अपने पांव पहले के मुकाबले बहुत अधिक फैला लिए। इसके साथ-साथ भाजपा ने बहुत सारी चीजों को लेकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद का नारा भी लगा दिया। जिस तरह की तकलीफदेह नोटबंदी रही, और उसमें तकलीफ पाते हुए लोग जिस तरह उस तकलीफ को देशभक्ति से जोडऩे के लिए उत्साही दिखे, वह एक अविश्वसनीय किस्म की बात रही। लोगों ने जब एक नामौजूद राष्ट्रीय जरूरत के नाम पर नोटों की अपनी सहूलियत, और रोज की अपनी कमाई को भूल जाने को भी बुरा नहीं माना, तो वह भाजपा के लिए उम्मीद से अधिक उपलब्धि थी।
लेकिन दूसरे राजनीतिक दलों को सीखने और समझने के लिए जो जरूरी है, वह भाजपा की मेहनत और उसका तौर-तरीका है। उसकी बहुत सी नीतियां गलत हो सकती हैं, लेकिन उसकी मेहनत और उसकी रणनीति ने उन गलतियों और उन गलत कामों को दबा दिया। जनता के बीच अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने और उन्हें प्रभावित करने की भाजपा की रणनीति से दूसरे राजनीतिक  दलों को सीखने की जरूरत है। भाजपा की आलोचना तो ठीक है, लेकिन देश के चुनावी लोकतंत्र में जिसे भी भाजपा से अगला चुनाव लडऩा है, वे भाजपा से कम से कम कुछ सीख भी लें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें