जंगली जानवर कहीं मर रहे कहीं मार रहे, सोचना जरूरी

संपादकीय
22 मई 2017


छत्तीसगढ़ में आज लगातार दूसरा दिन है जब हाथियों के पैरों तले दो महिलाओं की मौत हो गई है। राज्य के जिन इलाकों में हाथी हैं, वहीं पर जंगल भी है, और वहां पर गांवों की अर्थव्यवस्था जंगलों पर टिकी हुई है। कभी महुआ बीनने, तो कभी तेंदूपत्ता के लिए गांव के लोग जंगल जाते हैं और हाथियों का शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ लगातार इस प्रदेश में भालू मरते हुए दिख रहे हैं और आए दिन कहीं न कहीं भूख-प्यास से मरते हुए भालुओं की तस्वीरें आती हैं। इन दोनों के अलावा कई जगहों पर लोगों पर हमला करते हुए भालू की खबरें भी आती हैं, और लोग कहीं बिजली के तार बिछाकर तो कहीं जहर डालकर जानवरों को मारते हुए दिखते हैं।
इंसान और जानवरों का यह टकराव नया मुद्दा तो नहीं है, लेकिन यह बढ़ता हुआ मुद्दा जरूर है। छत्तीसगढ़ में जंगली जानवरों के हक को लेकर लोग हाईकोर्ट भी गए हुए हैं और सरकार वहां पर जवाब देने के लिए खड़ी हुई है। इस दिक्कत को देखें तो यह बात साफ समझ आती है कि जानवरों के हक के जंगलों पर जैसे-जैसे इंसान का कब्जा बढ़ा, वैसे-वैसे उनके पेड़ कटे, और उनके पीने के लिए पानी भी नहीं बचा। नतीजा यह होता है कि जंगल से जानवर आसपास की बस्तियों में कभी पालतू जानवरों के शिकार के लिए आ जाते हैं, तो कभी पानी पीने आ जाते हैं। और अगर इंसान यह सोचते हैं कि वे जंगलों पर काबिज होते जाएंगे, जंगलों के बीच से सड़कें निकालेंगे, वहां खदानों को खोदते रहेंगे, और पेड़ काटते रहेंगे, तो इसे बर्दाश्त करके जानवर चुप भी नहीं बैठेंगे। यह टकराव बढ़ते चलेगा, और हो सकता है कि धीरे-धीरे जानवर मिट ही जाएं। आज तो जहां जंगल बचे हुए हैं, वहीं पर जानवर हैं। और कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यह कहा था कि पड़ोसी राज्यों से हाथियों के छत्तीसगढ़ आने का यही मतलब है कि यहां पर जंगल अभी बचे हुए हैं। अगर जंगल न होते तो हाथी अपना इलाका छोड़कर यहां क्यों आते? लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच बरसों से हाथी-गलियारे की बात भी चल रही है, और ऐसा न होने पर हाथियों और इंसानों का टकराव होते चल रहा है, जिसमें आमतौर पर जान इंसानों की जा रही है, और ऐसे इंसानों की जा रही है जो कि जंगल गए बिना जिंदा रह नहीं सकते।
हमारा मानना है कि जंगलों में शहरों को घुसना बंद करना होगा। आज टेक्नालॉजी ने शहरों को आसमान की तरफ ऊपर उठने की सहूलियत दी है। शहरों को अपनी जमीन पर ऊंची इमारतें बनानी होगी, और जंगलों की तरफ जाना बंद करना होगा। इसके बिना यह तबाही नहीं रूकेगी, और जंगलों का मिटना महज जंगली जानवरों के लिए खतरा नहीं है, धरती के पर्यावरण के लिए भी खतरा है, और पेड़ों के घटते चले जाने से बारिश का पानी जड़ों के आसपास की मिट्टी को भी नदियों में ले आएगा, उनमें गाद भर देगा, नदियों की पानी की क्षमता घट जाएगी, और कुल मिलाकर जमीन के नीचे का पानी घट जाएगा। इसलिए जंगलों को बचाना जानवरों के लिए जरूरी नहीं है, यह इंसान के खुद के लिए जरूरी है, और आज जानवरों की बदहाली को एक संकेत और सुबूत मानना चाहिए कि इंसान अपने काम के जंगलों को खत्म कर रहा है, खत्म कर चुका है। इस मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार को बेबस करने के लिए वन्य प्राणी संगठनों और पर्यावरणवादियों को लगातार दबाव बढ़ाना होगा। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें