दाऊद-प्रेमी मंत्री-विधायक पर भाजपा कुछ करेगी?

संपादकीय
26 मई 2017


महाराष्ट्र की खबर कुछ परेशान करती है कि वहां कुख्यात मुजरिम दाऊद इब्राहिम के परिवार की शादी में महाराष्ट्र के एक मंत्री, कुछ विधायक, और कई पुलिसवाले शामिल हुए। दाऊद की पकड़ और उसकी ताकत हमेशा से इतनी रहती आई है कि ऐसे बहुत से लोग और बहुत से फिल्मी कलाकार, गायक, दाऊद के जन्मदिन पर दुबई जाकर नाचते-गाते रहे हैं, और देश के बड़े-बड़े क्रिकेट सितारे दाऊद की मेहमाननवाजी पाते रहे हैं। लेकिन महाराष्ट्र का एक भाजपा मंत्री और भाजपा के कई विधायक, स्थानीय नेता, और पुलिसवाले दाऊद के घर की दावत में पहुंचते हैं, तो भाजपा और शिवसेना के हाथ से दाऊद के खिलाफ एक मुद्दा निकलता है और देश के अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों के पाकिस्तान-परस्त होने के हिन्दूवादी हमले खारिज होते दिखते हैं।
सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके अगल-बगल मंच पर आकर कोई खड़े हो जाएं तो यह अलग बात है, लेकिन जब ऐसे प्रमुख लोग किसी समारोह में जाकर शामिल होते हैं, तो यह नहीं माना जा सकता कि वे उस परिवार की साख से अनजान रहे होंगे। जब दाऊद के सारे रिश्तेदारों पर नजर रखी जा रही है तो ऐसे में महाराष्ट्र के इतने नेता-अफसर इस रिश्तेदारी से अनजान नहीं हो सकते। ऐसे में कांग्रेस के एक प्रवक्ता को देश को यह याद दिलाने का मौका मिल गया है कि एक तरफ तो ब्रिटेन मैनचेस्टर में अभी हमला करने वाले एक मुस्लिम नौजवान के रिश्तेदारों को भी दो दिनों में लीबिया से पकड़कर ला चुका है, और दूसरी तरफ दाऊद इब्राहिम को पकडऩे के सारे दावों के बावजूद अब तक भारत सरकार उसकी पाकिस्तान में मौजूदगी भी साबित नहीं कर पाई है। मोदी सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर महाराष्ट्र में उसके लिए यह बड़ी शर्मिंदगी की बात है कि उसके नेता देश की भावनाओं की इस कदर अनदेखी कर रही है। कुछ लोगों का यह तंज कसना भी जायज है कि अगर महाराष्ट्र के इस हिन्दू भाजपाई मंत्री और हिन्दू भाजपा विधायकों की जगह किसी और पार्टी के मुस्लिम नेता अगर दाऊद के परिवार की दावत में पहुंचे होते, तो उन्हें और उनकी पार्टी को देश के गद्दार करार देकर पाकिस्तान जाने के लिए कह दिया जाता।
यह बात सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं है, और सिर्फ भाजपा के साथ नहीं है, पूरे देश में अधिकतर पार्टियों के नेताओं के आसपास सत्ता के दलाल, तरह-तरह के मुजरिम, और तरह-तरह की संदिग्ध साख वाले लोग ही अधिक मंडराते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ में ही हम देखते हैं कि कई मंत्रियों के निजी स्टॉफ के लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के अंधाधुंध मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन उन मंत्रियों को ऐसे ही निजी सहायक पसंद आते हैं, और मीडिया या जनचर्चा को हिकारत से देखते हुए मंत्री या दूसरे नेता अपने निजी सहायकों को कायम रखते हैं। आम चर्चा यह भी रहती है कि ऐसे कर्मचारी दलालों की तरह काम करने लगते हैं, और कुछ बरस पहले यह भी सुनाई पड़ा था कि भाजपा संगठन ऐसे निजी कर्मचारियों को हटाने वाली भी थी, लेकिन हमें ऐसा एक भी कर्मचारी हटते नहीं दिखा। सत्ता का मिजाज ही कुछ ऐसा रहता है कि उसके इर्द-गिर्द सत्ता के दलाल जुट जाते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि गुड़ के टुकड़े पर मक्खियां मंडराने लगती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को चाहिए कि पूरे देश में अपनी पार्टी के लोगों के चाल-चलन को लेकर एक आचार संहिता बनाएं, और दलालों-मुजरिमों से अपनी सरकारों को बचाकर रखें। सत्ता के तीन बरस पूरे होने पर भाजपा देश भर में कम से कम यह एक बड़ा और कड़वा फैसला ले सकती हैं। अभी भी भाजपा के भीतर सच या गलत, पता नहीं जैसी भी हो, ऐसी साख है कि मोदी और शाह की नजर देश भर में पार्टी के लोगों पर बनी रहती है। महाराष्ट्र के दाऊद-प्रेमी अपने नेताओं, और देश भर के अपने दलाल-प्रेमी मंत्रियों पर तीन बरसके बाद भी अब तक उनकी नजर पड़ी हो ऐसा दिखता नहीं है।

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