जानवरों को कटने से बचाने के नाम पर एक खराब कानून

संपादकीय
27 मई 2017


केन्द्र सरकार ने जानवरों को कटने से बचाने के लिए एक नया कानून लागू किया है, और इसका व्यापक असर देश भर में कई तबकों पर होगा। इस नए कानून के तहत गाय, सांड, भैंस, बैल, बछड़े, ऊंट जैसे जानवरों को किसी भी पशु-बाजार से बूचडख़ाने ले जाने के लिए, या कि काटने के लिए नहीं खरीदा जा सकेगा। खरीदने और बेचने वालों को जिला स्तर की सरकारी कमेटी से कई तरह की इजाजत लेनी पड़ेगी, और घोषणा पत्र देना होगा कि वे खरीदने के बाद छह महीने तक जानवर को नहीं बेचेंगे। इस कानून के तहत अब इन जानवरों की धार्मिक उद्देश्य से बलि भी नहीं दी जा सकेगी।
गाय को बचाने का मोदी सरकार का अभियान अब बढ़ते हुए गाय-भैंस परिवारों के अलावा ऊंटों तक पहुंच गया है, और एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाने पर जितने तरह की रोक लगाई गई है, उन सबके चलते पशुओं का कारोबार असंभव सा हो जाएगा। आज भी पूरे देश में जगह-जगह, खासकर उत्तर भारत में गौरक्षकों के नाम पर हिंसक गुंडागर्दी करने वाले लोग जानवरों को कानूनी रूप से ले जाने वालों को भी मार डाल रहे हैं। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त ओडिशा में लोग जख्मी पड़े हैं जो कि तमिलनाडू से गायों को ट्रेन में ले जा रहे थे और उन्हें मिजोरम सरकार को सप्लाई करने वाले थे ताकि किसानों का दूध का कारोबार हो सके। लेकिन उन्हें ट्रेन से उतारकर मारा गया, और गायों को भी उतार लिया गया। इन गौरक्षकों ने रेलवे कर्मचारियों को भी पीटा।
आज सत्तारूढ़ लोगों में से शुद्धतावादी या शाकाहारी लोगों का एक छोटा तबका खानपान की अपनी सोच को न सिर्फ दूसरे अल्पसंख्यकों धर्मों पर थोप रहा है, बल्कि वह हिन्दू समाज के भीतर के भी दलित-आदिवासियों और असंख्य ओबीसी लोगों पर भी शाकाहार को थोप रहा है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, और मोदी सरकार की चुनावी मोर्चे पर चल रही शोहरत के चलते हुए अभी तो यह खप जा रहा है, लेकिन इससे जो तकलीफ और नाराजगी दसियों करोड़ लोगों में हो रही है, वह किसी चुनौती के मौके पर किसी भी पार्टी के लिए घातक साबित हो सकती है। लेकिन हम राजनीतिक नफे-नुकसान से परे भी यह देख रहे हैं कि इस देश में कुछ जानवरों को बचाने के लिए जिस तरह से इंसानों को कुर्बान किया जा रहा है, और देश के लोगों की खानपान की विविधता को हिंसा के साथ खत्म किया जा रहा है, वह लोकतंत्र नहीं है। भारत में कभी गोमांस खाया ही नहीं जाता था, ऐसा एक पाखंडी झूठ फैलाया जा रहा है, और हिंसा के साथ इस झूठ को लागू किया जा रहा है। हमारा यह भी मानना है कि इस नए कानून के खिलाफ केरल सरकार ने अदालत जाने की जो घोषणा की है, उसका असर होगा और अदालत से यह नया कानून खारिज होगा।
जानवरों को खाने के अलावा भी अनंतकाल से जानवरों को खरीद-बेचकर लोग अपना काम चलाते आए हैं, और उस सिलसिले को खत्म करके यह सरकार एक ऐसा इंस्पेक्टर राज लागू कर रही है जिसमें वर्दीधारी इंस्पेक्टर तो रहेंगे ही, धार्मिक दुपट्टे पहने हुए हिंसक गुंडे भी अपने आपको गौरक्षक साबित करते हुए हिंसा करेंगे। आज भारत के किसान गरीबी और बेबसी में आत्महत्या कर रहे हैं, इस किस्म की तमाम रोकटोक उनकी हालत और खराब करेगी।

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