जिन इलाकों में फौज तैनात है, वहां लोग ऐसा नहीं सोचेंगे

संपादकीय
29 मई 2017


भारत में लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों को कुचलने का सिलसिला जारी है। और इसमें अब सेना बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। कश्मीर में पथराव से बचने के लिए सेना की एक टुकड़ी के मेजर ने यह तय किया कि पत्थरबाजों में से एक को जीप के सामने बांधकर वहां से निकला जाए। बाद में केन्द्र सरकार से लेकर सेना के आला अफसरों तक ने इस तरीके का समर्थन किया और इस मेजर को सम्मानित भी किया। बात यहीं पर अगर खत्म हो जाती तो भी एक बार लोग इसे भूलने की कोशिश करते। लेकिन केन्द्र सरकार और सेना मानो कश्मीरियों के जख्मों को कुरेदने और भारत सहित बाकी दुनिया के मानवाधिकारवादियों के मुंह पर जूता मारने पर आमादा है। आज थलसेनाध्यक्ष का एक बयान सामने आया है कि यह तो जीप के सामने पत्थरबाज को बांधकर सेना वहां से सुरक्षित निकली, वैसे तो सेना यह चाहती थी कि प्रदर्शनकारी गोलियां चलाएं, ताकि फौज भी उसके जवाब में वह कर सके जो कि वह करना चाहती है।
थलसेनाध्यक्ष का यह बयान एकदम भयानक और अलोकतांत्रिक है। देश के भीतर अपने ही नागरिकों पर, चाहे वे पत्थर ही क्यों न चला रहे हों, उन पर गोली चलाने की हसरत और नीयत की ऐसी घोषणा करना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं के ठीक खिलाफ है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार की नीयत भला अपने लोगों पर गोली चलाने की कैसे हो सकती है? और देश के भीतर सेना की तैनाती का मतलब यही होता है कि देश और प्रदेश की सरकारें अपने काम में नाकामयाब रही हैं, और पुलिस तथा केन्द्रीय सुरक्षा बल मिलकर जब हालात पर काबू नहीं कर पा रहे हैं, तब सेना को बुलाया गया है। सेना के किसी इलाके में आने का यह मतलब कहीं भी नहीं होता कि सेना अपने लोगों पर गोली चलाने की चाहत रखे, खासकर पत्थर चलाते लोगों के लिए यह कहना कि बेहतर होता कि वे गोली चलाते ताकि थलसेना भी वह कर सकती जो कि वह करना चाहती है।
आज भारत के माहौल में सेना की कार्रवाई को, उसकी किसी भी कार्रवाई को, उसकी कैसी भी कार्रवाई को राष्ट्रप्रेम से जोड़कर उसे सही ठहराने का जो आक्रामक राष्ट्रवाद चल रहा है, उससे दुनिया के किसी और देश का कोई नुकसान नहीं हो रहा, उससे भारत के पड़ोस में बसे हुए, और दुश्मन समझे और कहे जाने वाले देश का भी कोई नुकसान नहीं हो रहा, इस आक्रामकता से देश का खुद का नुकसान हो रहा है, और देश के भीतर जो लोग ऐसी आक्रामकता से असहमत हैं, उन्हें गद्दार ठहराकर पाकिस्तान जाने को कहा जा रहा है। आज ही केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के एक फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है कि देश के हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में शौर्य दीवाल बनाई जाएगी जो कि भारत की फौज की वीरता के बारे में होगी। अब तक कॉलेज और यूनिवर्सिटी को राजनीति से और आक्रामक राष्ट्रवाद से परे रखा जाता था। लेकिन अब उन्हें भी इसमें शामिल किया जा रहा है, और दिलचस्प बात यह है कि आज देश में दर्जनों अलग-अलग जलते-सुलगते मुद्दे हैं, जिनमें से एक का भी राष्ट्रवाद से, या कि किसी दुश्मन देश से कुछ भी लेना-देना नहीं है, और वे तमाम भारत के अपने घरेलू मुद्दे हैं। ऐसे में इन तमाम बातों को छोड़कर नए-नए भावनात्मक विवादों को छेडऩा देश के लिए प्रतिउत्पादक काम है जिससे नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होने वाला है। कोई भी देश महज अपने एक झूठे इतिहास के मौजूदा पाखंडी गौरव को खड़ा करके आगे नहीं बढ़ सकता। ऐसे सम्मोहन में देश की आबादी को डुबोया तो जा सकता है, लेकिन उसे तैराया नहीं जा सकता। ऐसे तमाम अलोकतांत्रिक और गैरजरूरी मुद्दों से देश की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को भीड़ की मानसिकता में लाकर उसे एक चुनावी ध्रुवीकरण का शिकार तो बनाया जा सकता है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और देश का विकास इससे चौपट हो रहे हैं। हम आखिर में एक बार फिर फौज के इस रूख को, और इस रूख के तरफ सरकार के रूख को लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक मानते हैं, और इसकी तारीफ महज वे लोग कर सकते हैं जिनके अपने इलाके में फौज तैनात नहीं हैं। हिन्दुस्तान में जिन इलाकों में फौज है, वहां के लोग ऐसा नहीं सोचेंगे कि पत्थर की जगह भीड़ गोलियां चलाती तो अच्छा होता, क्योंकि जवाब में फौज को भी गोलियां चलाने मिलतीं। 

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